माँ, काश तुमने यह भी सिखाया होता
स्वाति अग्रवाल
कोलकाता
हर बेटी को बचपन से सहनशीलता, शालीनता और त्याग का पाठ पढ़ाया जाता है। पर जब वही गुण उसके आत्मसम्मान पर भारी पड़ने लगें, तब उसके मन में कुछ ऐसे प्रश्न जन्म लेते हैं...
माँ,
तुमने कहा था—
सौम्य बनो,
गंगा सी निर्मल और शीतल बनो।
दो घरों का मान रखना है,
अपनी शालीनता से
सबका सम्मान रखना है।
पर जब देखा,
मेरी चुप्पी को कमजोरी जान लिया, सहन करना ही जैसे
मेरा आचरण मान लिया।
इस संसार में देखा,
जो तेवर दिखाता है,
वही सही कहलाता है,
जो अपनी शर्तों पर जीता है,
वही सब पर हावी हो जाता है।
खुद से ही प्यार करो,
किसी का न सम्मान करो,
अपनी बात को ऊपर रख ,
चाहे सबका अपमान करो। हकीकत में जब यह संसार की कहानी
दिखी
माँ, तुम्हारी सीख
फिर कुछ बेमानी सी लगी।
जैसे-जैसे घाव गहरे होते गए, तुम्हारी बातें – बहुत बचकानी सी लगीं।
माँ, काश, तुमने मुझे भी
थोड़ा बेबाक होना सिखाया होता,
लोगों को उनके ही व्यवहार का
उत्तर देना बताया होता।
किसी की हिम्मत न होती
मेरे मन और आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाने की,
अपनी ज़िद पूरी करने के लिए
मेरी ख्वाहिशों को दबाने की।
काश, तुमने कहा होता—
सिर्फ़ सौम्य नहीं,
स्वाभिमानी बनो,
हर अन्याय के विरुद्ध
एक कहानी बनो।
झुको जहाँ प्रेम हो,
सम्मान हो,
पर मत झुकना
जहाँ अपमान हो।
चुप्पी से
हर रिश्ता बचता नहीं,
सहन करना
तुम्हें हमेशा जँचता नहीं।
अपनी आवाज़ को पहचान दिलाना,
ज़रूरत पड़े तो
सच के लिए डट जाना।
संस्कार भी रखना,
स्वाभिमान भी रखना,
हर हाल में
अपने होने का मान भी रखना।
माँ,
तुम्हारी सीख आज भी प्यारी है,
बस उसमें एक बात और हमारी है।
सहनशीलता नारी का गहना है,
पर आत्मसम्मान उसका असली नगीना है।
संस्कार और स्वाभिमान
जब साथ-साथ चलते हैं,
तभी जीवन के रिश्ते
सच्चे अर्थों में खिलते हैं।




