अशोक अंजुम की नवीनतम ग़ज़लें
अशोक अंजुम, अलीगढ़
निकले है दिल से आह ज़माने के बाद भी
आते हो बहुत याद भुलाने के बाद भी
ऐसा भी क्या गुरूर के ज़िद टूटती नहीं
रूठे हैं मेरे यार मनाने के बाद भी
तारी हैं दिलो-जान पे बेचैनियां हुजूर
उल्फ़त की हर इक रस्म निभाने के बाद भी
ऐसी लगी कि ज़िन्दगी कुल हो गई धुआं
बुझती नहीं है आग बुझाने के बाद भी
आता नहीं है यार को मुझ पर कोई रहम
‘अंजुम’ गिरेबां चाक दिखाने के बाद भी
जो ग़म इधर-उधर के तेरे घर पे आ गए
दुनिया के सब सवाल मुकद्दर पे आ गए
कैसे बचाएं जान कि किस-किस की क़सम दें
किस नाजनीं के बाल ये बिस्तर पे आ गए
मैं भी तो ये एहसास लिए जीता रहा हूं
फिर कैसे हुनर कहने के शायर पे आ गए
ख़्वाहिश जो मेरी मैंने कहीं रख के छोड़ दीं
सर पर चढ़े गुबार भी ठोकर पे आ गए
बिगड़ी हुई औलाद तो बेफिक्र सो रही
जितने भी थे इल्ज़ाम वो नौकर पे आ गए
कितना संभल-संभल के चलाया गया इसे
कैसे लहू के दाग़ ये खंजर पे आ गए
उस बाप को जो बोझ समझता था कल तलक
उठते ही उसके बोझ कई सर पे आ गए




