मनावता के रक्षक : भगवान परशुराम

नवी मुंबई
ददर्श भीमसंकाशं जटामण्डलधारिणम् ।
भार्गवं जामदग्न्यं तं राजराजविमर्दिनम् ।।
(वा.रा., बालकांड, 73/18)
आद्यकवि वाल्मीकि रामायण में भृगुवंशी परशुराम के आगमन का विशद वर्णन आता है। रामायण में उनके विराट व्यक्तित्व का सर्वाङ्गपूर्ण चित्रण आद्यकवि वाल्मीकि ने किया है। भगवान परशुराम के आगमन और अजगव नामक शिवधनुष के तोड़े जाने पर राम और लक्ष्मण के साथ संवाद का प्रसंग गोस्वामी तुलसीदासकृत श्रीरामचरितमानस में भी है। यह प्रसंग बहुत प्रसिद्ध है। वाल्मीकिकृत रामायण में प्रसंग अलग है। रामायण में श्रीराम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के विवाहोपरांत जब अयोध्या के सभी नगरवासी, बारातीजन लौट रहे होते हैं, तब भगवान परशुराम जी का आगमन होता है। राजा दशरथ के नेतृत्व में बारात लौट रही है। आगे-आगे ऋषिगण चल रहे हैं। दायजा (दहेज) में मिली हुई गौएँ, रत्न, आभूषण, वस्त्र, मणि-माणिक्य आदि लेकर अयोध्यावासी लौट रहे हैं। तभी भीषण अपशकुन होता है। मार्ग में भयंकर पक्षी बोलने लगते हैं, और मृग दाहिनी ओर से रास्ता काटते हैं। इसे देखकर राजा दशरथ महर्षि वशिष्ठ जी से पूछते हैं, कि इन अपशकुनों का क्या प्रभाव है। कहीं कोई भीषण संकट तो नहीं आने वाला…। गुरु वशिष्ठ जी बताते हैं, कि भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है। एक भयभीत करने का चिह्न है, तो दूसरा अर्थात् मृगों के द्वारा रास्ता काटा जाना भय के नाश का द्योतक है। इसी बीच पृथ्वी काँपने लगती है, बड़े-बड़े वृक्ष टूटकर गिरने लगते हैं; धूल के कारण ऐसा लगता है, कि सूर्यदेव छिप गए हैं। चारों ओर अंधकार छा जाता है, सैनिकों के छक्के छूट जाते हैं, धूल की धुंध के कारण कुछ भी दिखाई नहीं देता है। धरती कंपन करने लगती है-
कम्पन्यमेदिनीं सर्वां पातयंश्च महाद्रुमान् ।
तमसा संवृतः सूर्यः सर्वा न प्रबभुर्दिशः ।।
भस्मना चावृतं सर्वं समूढ़मिव तद्बलम् ।
वशिष्ठऋषयश्चान्ये राजा च ससुतस्तदा ।।
ससंज्ञा इव तत्रासन्सर्वमन्यद्विचेतनम् ।
तस्मिंस्तमसि घोरे तु भस्मच्छन्नेव सा चमूः ।।
(वा.रा., बालकांड, 73/15-17)
ऋषि वशिष्ठ सहित अन्य ऋषियों और राजा दशरथ व राम सहित अन्य राजकुमारों के अतिरिक्त सभी अयोध्यावासी और सैनिक आदि अचेत हो जाते हैं जब भगवान परशुराम जी का आगमन होता है। विशाल जटाजूट फैलाए हुए भयंकर रूप धारण किए धरती को कंपायमान करते हुए परशुराम जी का आगमन ऐसा लगता है, मानों त्रिपुरासुर को मारने के लिए शिवजी ही आ गए हों। आद्यकवि वाल्मीकि जी परशुराम जी के व्यक्तित्व का विशद वर्णन करते हैं। कैलास पर्वत की तरह दुर्धष, प्रचंड, विकट; कालाग्नि के समान दुस्सह और आतंकी-अपराधी लोगों के लिए काल के समान भगवान परशुराम राजा दशरथ के सम्मुख खड़े हैं।
वाल्मीकि जी वर्णन करते हैं, कि विकराल रूप धारण किए परशुराम का आगमन राजा दशरथ को चिंता में डाल देता है। वे भयग्रस्त हो जाते हैं, कि अब कौन-सी विपत्ति आने वाली है। वे ऋषिगणों को आगे करते हैं। ऋषिगण भगवान परशुराम का अभिवादन करते हैं। परशुराम जनकपुरी में हुए राम के विवाह का उल्लेख करते हुए कहते हैं, कि राम के पराक्रम को उन्होंने भी सुना है। राम ने जिस धनुष को भंग किया है, वह शिवजी का धनुष था। उस धनुष का तोड़ा जाना विस्मय में डालने वाला है, आश्चर्यचकित करने वाला है। शिवधनुष के तोड़े जाने का वृत्तांत सुनकर ही हम यहाँ आए हैं, और अपने साथ जमदग्नि ऋषि का दूसरा धनुष लेते आए हैं। इस धनुष पर प्रत्यञ्चा चढ़ाकर अपनी वीरता का प्रदर्शन मेरे समक्ष करो।
परशुराम जी शिव और विष्णु जी के धनुषों का प्रसंगानुकूल वर्णन करते हैं। वे कहते हैं, कि त्रिपुरासुर का वध करने के लिए शिवजी ने जिस अजगव नामक धनुष का उपयोग किया था, उसे तुमने (राम ने) तोड़ दिया है। यह दूसरा धनुष विष्णु जी का है, और यह भी दुर्धर्ष है, बहुत मारक है। विश्वकर्मा जी ने ये दोनों धनुष बहुत सावधानी और कुशलता से बनाए थे। देवताओं ने एक शिवजी को दिया था, और दूसरा विष्णु जी को दिया था। दोनों में से किसका धनुष श्रेष्ठ है, इस विषय को लेकर दोनों के मध्य भीषण संघर्ष भी हुआ और अंततः शिवजी ने अपना धनुष बाण सहित विदेह राज्य के महायशस्वी राजा देवरात को दे दिया था। श्रीराम ने इसी शिव धनुष को भंग किया था।
परशुराम जी बताते हैं कि मेरे पास विष्णुजी का धनुष है, जिसे विष्णु भगवान ने भृगुवंशी ऋचीक को दे दिया था। ऋचीक ने इसे मेरे पिता, अर्थात् महात्मा जमदग्नि को दे दिया। मेरे पिता महात्मा जमदग्नि को निरपराध ही सहस्रबाहु ने मार डाला। इस पर क्रोधित होकर मैंने क्षत्रियों से इस धरती को मुक्त कराया, क्षत्रिय-विहीन धरती को विजित कर मैंने महात्मा कश्यप को दान कर दिया था। तब से धरती को काश्यपी भी कहा जाने लगा।
भगवान परशुराम द्वारा विष्णु जी का धनुष श्रीराम को दिया गया। श्रीराम ने प्रत्यञ्चा चढ़ाकर अपने पराक्रम का प्रदर्शन किया। उन्होंने बाण का परिचालन किया, जिसने परशुराम के क्षात्र-स्वभाव को शांत-सौम्य वैष्णव स्वभाव में परिवर्तित कर दिया। तदुपरांत परशुराम जी महेंद्र पर्वत की ओर प्रस्थान कर गए।
वाल्मीकि रामायण में शिव जी और विष्णु जी के धनुषों का माहात्म्य बताया गया है। इसके साथ ही परशुराम जी के व्यक्तित्व की विराटता का वर्णन भी आता है। वाल्मीकि रामायण में परशुराम जी के इस प्रसंग का आधुनिक विज्ञानसम्मत पद्धति से विश्लेषण करें, तो हमारे आराध्य परशुराम जी के पराक्रम और विश्व कल्याण के लिए उनके द्वारा किए गए कार्य स्पष्ट होते हैं। महात्मा जमदग्नि पर सहस्रबाहु का अकारण हमला और उनकी हत्या परशुराम के लिए स्वीकार्य नहीं हो सकती थी। विश्व के कल्याण के लिए, मानवता की रक्षा के लिए, धर्म की संस्थापना के लिए क्रूरकर्मा और आततायियों का विनाश आवश्यक होता है। क्षत्रिय वर्ग में जिन्होंने भी अपने क्षात्र धर्म का त्याग करके लोगों को प्रताड़ित करना, आम जन को आतंकित करना, अन्याय और अत्याचार करना नहीं छोड़ा, उन सभी को भगवान परशुराम ने सबक सिखाया। ऐसे क्रूर, उच्छृंखल, आततायी शासकों से धरती को एक बार नहीं, इक्कीस बार मुक्त कराया, और जब भगवान परशुराम स्वयं आश्वस्त हो गए, कि क्रूरकर्मा-आततायी क्षत्रियों से यह पृथ्वी मुक्त हो गई है, तब उन्होंने शस्त्र को द्वैतीयक स्थान देकर शास्त्र के अनुशीलन को प्राथमिकता दी, और कश्यप ऋषि को दक्षिणा में समूची धरती देकर स्वयं महेंद्र पर्वत पर जाकर रहने लगे।
श्रीराम के द्वारा शिवजी का धनुष तोड़ा जाना कोई सामान्य घटना नहीं थी। यह एक प्रकार से संकेत था, कि शिव जी के अत्यंत भीषण व प्रबल संहारक धनुष को तोड़ने वाला कोई सामान्य व्यक्ति नहीं होगा। यदि किसी आततायी और मानवता के संहारक का यह कृत्य हुआ, तो पुनः अतीत दोहराया जा सकता है। सहस्रबाहु जैसा क्रूरकर्मा व्यक्ति यदि हुआ, तो काश्यपी पुनः खतरे में आ जाएगी। इस चिंता के कारण भगवान परशुराम बहुत व्यग्र थे। वे बहुत क्रोध में थे। आद्यकवि वाल्मीकि ने उनके आगमन का जैसा चित्र खींचा है, और संवाद प्रस्तुत किया है, वह इस तथ्य को प्रकट करता है।
श्रीराम के समक्ष पहुँचे भगवान परशुराम के सामने दो प्रश्न थे। पहला यह जानना, कि वह कौन और कैसा व्यक्ति है, जिसने शिवजी के धनुष को तोड़ा है। और दूसरा विष्णु जी के धनुष को पात्र व्यक्ति को सौंपना। उनके लिए यह स्पष्ट हो चुका था कि भीरु, कातर और साहसहीन व्यक्ति कभी भी शिवजी के धनुष को नहीं उठा सकता। उन्होंने इसे परखने के साथ ही श्रीराम की पात्रता को भी परखा और आश्वस्त हुए, कि यदि वे परंपरा से प्राप्त विष्णु जी के इस धनुष को श्रीराम को दे देते हैं, तो श्रीराम अवश्य ही इसका उपयोग राक्षसों के संहार के लिए करेंगे, मानवता के कल्याण के लिए करेंगे। वे श्रीराम को इस कसौटी पर खरा पाते हैं, और श्रीराम को धनुष प्रदान करते हैं।
गोस्वामी तुलसीदासकृत श्रीरामचरितमानस में भी परशुराम जी का प्रसंग आता है। राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद का पूरा एक खंड ही है। इसमें परशुराम जी का आगमन राजा जनक के महल में चल रहे सीता-स्वयंवर के आयोजन के मध्य होता है। परशुराम जी को ज्ञात था, कि देश-देश के अनेक राजा विदेहराज की सुता के स्वयंवर में भाग लेने के लिए आए हैं। इनमें रावण जैसे शासक भी हैं। ऐसी स्थिति में शिवजी का धनुष-भंग भविष्य के लिए बड़े संकट का संकेत भी हो सकता है। इस कारण भगवान परशुराम जी आकर देखते हैं। लक्ष्मण के साथ उनका संवाद होता है। श्रीराम बहुत विनम्रता के साथ अपना परिचय देते हैं। परशुराम का क्रोध शांत होता है। वे श्रीराम और सीता को शुभकामनाएँ देते हैं। श्रीराम को पात्र जानकर अपना धनुष देते हैं और महेंद्र पर्वत की ओर प्रस्थान करते हैं। गोस्वामी जी ने इस समूचे प्रसंग को मंचन की दृष्टि से भी बहुत रुचि से लिपिबद्ध किया है। मानस का लोकपक्ष भी है, जिसे रामलीलाओं के मंचन के रूप में जानते हैं। रामलीलाओं के विविध प्रसंगों में परशुराम जी का यह प्रसंग बहुत प्रसिद्ध और लोकप्रचलित है। बुंदेलखंड अंचल में परशुरामी के रूप में रामलीला का यह अंश बहुत प्रचलित है। कानपुर के सजेती में परशुरामी के बहुत अच्छे कलाकार हैं, जिनकी देश-विदेश में अच्छी ख्याति है। आज भी परशुरामी देखने के लिए रात-रात भर जागने वालों की कमी नहीं है। गोस्वामी जी ने परशुराम जी के प्रसंग के माध्यम से समाज में धर्म-स्थापनार्थ सक्रिय रहने वाले, मानवता के हितरक्षक भगवान परशुराम जी के विराट व्यक्तित्व को उकेरा है।

आद्यकवि वाल्मीकि से गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा, साथ ही देश-विदेश में रचित विभिन्न रामकथाओं में भगवान परशुराम का वर्णन समाज को भयमुक्त करने वाले, अन्याय व आतंक का शमन करने वाले, मानवता के रक्षक, आत्मसम्मान और स्वाभिमान को जीवंत रखने वाले भगवान परशुराम के प्रति असीमित-अगाध आस्था को प्रदर्शित करता है। भृगुकुलनंदन परशुराम ने पृथ्वी को जीतकर उस पर शासन करने की मंशा कभी नहीं रखी। उनका ध्येय विश्व में शांति, सद्भावना, सहिष्णुता, सामंजस्य, निर्भयता, निडरता स्थापित करने का रहा है। उन्होंने जीवन-पर्यंत अन्याय का प्रतिकार किया, अन्यायी को दंड दिया और धरती को अपराधियों-आतंकियों से मुक्त किया। लोक का हित, लोक का कल्याण केवल शास्त्रों के अनुशीलन से नहीं हो सकता। इसके लिए शस्त्र भी उठाना पड़ सकता है। विनय की भाषा को न समझने वालों के लिए कोप की आवश्यकता पड़ती है, दंड देना अनिवार्य हो जाता है। इसी कारण यदि लोक की रक्षा के लिए शस्त्र भी उठाना पड़े, तो उससे पीछे नहीं हटना चाहिए। निज सामर्थ्य और शक्तिबल को सदैव उसी तरह से समृद्ध करने की आवश्यकता है, जैसे शास्त्रों के सहारे बुद्धिबल को समृद्ध करते हैं।

भगवान परशुराम इसी कारण एक युग के नहीं, वरन् काल की परिधि से परे हैं, चिरंजीवी हैं। भारत सहित विश्व के विभिन्न स्थानों में उनकी पूजा होती है। देवताओं का घर केरल तो उनके फरसे के प्रहार से ही बना है। पूर्वोत्तर में परशुराम कुंड जन-आस्थाओं का बड़ा केंद्र है। उनके पराक्रम से लोक अपनी रक्षा की जीवनीय शक्ति को प्राप्त करता है।
अरुणाचल प्रदेश के लोहित जनपद में स्थित परशुराम कुंड भगवान परशुराम के परमार्थ का जीवंत साक्ष्य है। उन पर चढ़ा मातृ-हत्या का पाप इसी ब्रह्मकुंड में धुला था। इस कुंड को अत्यंत जीवंत और जाग्रत तीर्थ जानकर लोक के कल्याण हेतु भगवान परशुराम ने इस कुंड के पवित्र जल को पृथ्वी तक पहुँचाने के लिए पर्वत काटकर धारा निकाली। यही ब्रह्मपुत्र नदी बना। लोहित में गिरकर परशुराम का परशु भी पापमुक्त हो गया, और इसके उपरांत वे शताधिक वर्षों तक लड़ते रहे, संघर्ष करते रहे, ताकि पृथ्वी को क्रूरकर्मा आततायियों से मुक्त करा सकें। जब उनका प्रतिशोध शांत हो गया, तब उन्होंने सिंधु सागर में अपना परशु फेंक दिया, जिससे वर्तमान केरल राज्य और कोंकण प्रांत का निर्माण हुआ। स्कंद पुराण के सह्याद्रि खंड में इसका विस्तार से वर्णन मिलता है। सप्त कोंकण, अर्थात् अपरांतक और गोमांतक क्षेत्र को मिलाकर सिंधुसागर के किनारे-किनारे परशु के आकार का भू-क्षेत्र भगवान परशुराम के द्वारा बसाया गया है। इस कारण यह परशुराम श्रीक्षेत्र कहलाता है। मान्यता है, कि त्रिवेंद्रम (केरल) का महेंद्रगिरि ही वह पर्वत है, जहाँ भगवान परशुराम विराजते हैं। ऐसे ही वर्तमान महाराष्ट्र राज्य के अंतर्गत आने वाले कोंकण क्षेत्र में चिपलूण (जनपद- रायगड़) में अत्यंत प्राचीन परशुराम मंदिर है, जो परशुराम श्रीक्षेत्र के अंतर्गत आने वाले अनेक प्रसिद्ध और महत्त्वपूर्ण मंदिरों में से एक है। इस मंदिर के साथ मध्यकाल के परम प्रतापी वीरवर छत्रपति शिवाजी महाराज की अगाध आस्था जुड़ी रही है।
शिवाजी महाराज के समकालीन कवि एवं उनके द्वारा ही कवींद्र की उपधि से विभूषित कवींद्र परमानंद द्वारा शिवाजी राजे की जीवनी ‘श्रीशिवभारत’ का प्रणयन किया गया था। इसमें उंबरखिड़ी के युद्ध के प्रसंग में अत्यंत महत्त्वपूर्ण वर्णन आता है-
स तत्र वरदं विश्वविश्रुतं चिरजीविनम् ।
रैणुकेयं वर्णनीयचरितं निरवर्णयत् ।।
अथासौ कालकामाभ्यां भ्रातृभ्यां परिवारितम् ।
भक्तिमान् भृशमर्हाभिभार्गर्वं समभावयत् ।।
अद्धा परशुरामोऽपि ध्वस्ताविद्धाधिपौजसे ।
पृथुं प्रसादमकरोदमुष्मै पृथिवीभृते ।।
(श्रीशिवभारत, 29, 75-77)
छत्रपति शिवाजी महाराज हिंदवी स्वराज की विजय-पताका फहराते हुए, विधर्मी म्लेच्छ आक्रांताओं को परास्त करते हुए आगे बढ़ते हैं। कवींद्र परमानंद वर्णन करते हैं, कि शिवाजी राजे चिपलूण में विश्वविख्यात, वरदाता रेणुकानंदन परशुराम के दर्शन करते हैं। शिवाजी पूर्ण आस्था और भक्ति के साथ परशुराम की पूजा-अर्चना करते हैं। भगवान परशुराम भी शिवाजी राजे पर बड़ी कृपा करते हैं। शिवाजी महाराज को संगमेश्वर में वियजश्री मिलती है, और वे हिंदवी स्वराज हेतु आगे बढ़ते जाते हैं।

भगवान परशुराम अधर्म और अन्याय के विरुद्ध खड़े होने वाले प्रत्येक योद्धा के आराध्य हैं। उन्होंने श्रीराम को धनुष सौंपकर धर्म की संस्थापना हेतु अपना उत्तराधिकारी बनाया था। भगवान परशुराम को सीमित और संकुचित मानसिकता से नहीं समझा जा सकता। एक वर्ग विशेष के लिए नहीं, प्रत्युत् हर युग में, प्रत्येक कालखंड में सभी के लिए, विश्व के कल्याण के लिए, धर्म की स्थापना के लिए, मानवता की रक्षा के लिए भगवान परशुराम आदर्श हैं, पूज्य हैं। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की बहुत प्रसिद्ध काव्य-कृति है- परशुराम की प्रतीक्षा। इस कृति का नाम दिनकर जी ने भगवान परशुराम के पराक्रम को समर्पित करते हुए रखा है। नेफा, अर्थात् पूर्वोत्तर से भगवान परशुराम का अन्यायियों-अत्याचारियों के प्रति प्रतिशोध प्रारंभ हुआ था, जो सप्त कोंकण के निर्माण के रूप में नवनिर्माण के साथ पूर्ण हुआ था। नेफा युद्ध (भारत-चीन युद्ध 1962) के संदर्भ सहित सृजित इस कृति के नामकरण में परशुराम के सदृश पराक्रम की भारत-जन की आकांक्षा झलकती है। भारत-भूमि अपने चरित-नायक, अपने आराध्य का स्मरण करती है। दिनकर जी लिखते हैं-
ताण्डवी तेज फिर से हुंकार उठा है,
लोहित में था जो गिरा, कुठार उठा ।
भगवान परशुराम शास्त्र ही नहीं, शस्त्र के साथ भी लोक के कल्याण हेतु संलग्न रहने का मार्ग प्रदर्शित करने वाले हमारे आराध्य देव हैं। अन्याय व अत्याचार के प्रतिकार हेतु हर युग, प्रत्येक कालखंड उनके प्रति आस्थावान होता है। उनका आदर्श, उनके द्वारा प्रदर्शित मार्ग आज के समय में भी प्रासंगिक है… इस कारण रेणुकानंदन, भृगुकुलभूषण परशुराम चिरंजीवी हैं, कालजयी हैं।




