क्या कुछ बदला

कर्नल प्रवीण त्रिपाठी
नोएडा

भारत को स्वतंत्रता प्राप्त किये हुए दशकों बीत गये एवं आज हम आज़ादी का अमृतकाल मना रहे हैं। भविष्य के बारे में सोचने से पूर्व हमेशा विगत का क्या कुछ बदला

भारत को स्वतंत्रता प्राप्त किये हुए पचहत्तर वर्ष बीत गये एवं आज हम आज़ादी का अमृतकाल मना रहे हैं। भविष्य के बारे में सोचने से पूर्व हमेशा विगत का आंकलन एवं विश्लेषण करना अति आवश्यक होता है। भूतकाल की उपलब्धियों एवं पीछे छूटे लक्ष्यों अध्ययन की नींव पर ही उनसे सीख लेते हुए भविष्य की योजनाएं बना सकते हैं। अतः विगत वर्षों का आंकलन कुछ मुख्य बिंदुओं के तुलनात्मक विश्लेषण से किया जा सकता है जो कि निम्नवत हैं।


  • • जनसंख्या
  • • शिक्षा
  • • स्वास्थ्य
  • • जीवन स्तर
  • • कृषि एवं सिंचाई
  • • उद्योग धंधे
  • • विज्ञान एवं तकनीक
  • • जलवायु एवं प्रकृति संरक्षण
  • • परिवहन
  • • सूचना क्रांति, मनोरंजन एवं संचार
  • • अन्य सामाजिक स्थिति सूचक

सबसे पहले जनसंख्या को देखें तो पाएंगे कि इस क्षेत्र में हमने सबसे अधिक प्रगति की है, परन्तु विडंबना यह है कि यह सुखद स्थिति नहीं है। स्वतंत्रता के बाद की पहली जनगणना के अनुसार आबादी 36 करोड़ थी जो अब लगभग 140 करोड़ के आसपास है। यह स्थिति अवांछनीय है क्योंकि वर्तमान वृद्धि दर 1% के आसपास है जिसके कारण हर वर्ष एक करोड़ के आसपास जनसंख्या बढ़ रही है। जिसका सीधा असर सामाजिक स्थिति पर पड़ता है क्योंकि वर्तमान संसाधन, अर्थव्यवस्था तथा ढाँचागत साधनों पर आबादी वृद्धि का प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। वैश्विक सोशल इंडिकेटर इंडेक्स में भारत का 102वां स्थान है जिसमें बहुत काम करने एवं बढ़ती जनसंख्या पर तत्काल लगाम लगाने की आवश्यकता है। इस विशाल जनसंख्या को, जो कि मूलतः गाँवों में रहती है तथा कृषि पर निर्भर है को साक्षर एवं शिक्षित करना एक गंभीर चुनौती है। आज़ादी प्राप्त होने के तिरसठ वर्षों के बाद भारत में साक्षरता दर 74.04 है (2011), जो कि 1947 में मात्र 18 % थी। भारत की साक्षरता दर विश्व की साक्षरता दर 84% से कम है। अतः इस दिशा में समग्र एवं सतत प्रयास करने की ज़रूरत है। क्योंकि शिक्षा ही जीवन की गुणवत्ता में हर प्रकार से अभिवृद्धि करती है। स्वतंत्रता के समय भारतीय अर्थव्यवस्था 33 मिलियन डॉलर के आसपास थी अतः धनाभाव के चलते स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति दयनीय थी। उस समय अधिकांश आबादी नीम-हकीमों पर ही निर्भर थी। इस क्षेत्र में शुरुआती दौर में सार्थक प्रयास नहीं हुए तथा इस स्वास्थ्य सेवाओं की प्रगति बहुत धीमी रही। परन्तु अब “आयुष्मान भारत योजना” के लागू होने से इस क्षेत्र में बड़े सुधार का सूत्रपात हुआ है।

भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ कृषि क्षेत्र को माना जाता है। परंतु विडंबना देखिये कि सदियों की संस्थागत अवहेलना के कारण देश का अन्नदाता बदहाल स्थिति में है और अति विपन्नता में जीने को अभिशप्त है। यह भी एक कठोर सत्य है कि भारतीय कृषि क्षेत्र में मूलतः सीमांत किसान हैं। जो सिंचाई के लिए वर्षा पर निर्भर हैं। बढ़ती आबादी के कारण सीमित जोत क्रमशः छोटी होते जाने के कारण दबाव बढ़ा जिससे आजीविका की खोज हेतु खेतिहरों का नगरों की ओर प्रस्थान हुआ। जिससे शहरों में प्रवासी कामगारों की आमद निरंतर बढ़ती रही और अब भी जारी है। इसके फलस्वरूप शहरों की सीमित ढांचागत व्यवस्था चरमरा गयी। जिसका संतोष जनक समाधान होना शेष है। विगत वर्षों में विभिन्न सरकारों कृषि एवं सिंचाई क्षेत्र में सुधारों पर काम किया ताकि उत्पादकता बढ़े। पर वह प्रयास पर्याप्त नहीं रहे। यद्यपि इस दिशा में अब भी काम हो रहा है, परंतु और करने की आवश्यकता है।

स्वतंत्रता के बाद औद्योगिक क्षेत्र में काफी बदलाव देखने को मिला। देश के कुटीर उद्योगों का स्थान मध्यम एवं भारी उद्योगों ने लिया। आरंभ में सरकारी क्षेत्र ही इसमें अग्रणी रहा, परन्तु बाद में सरकारों द्वारा निजी क्षेत्र की महत्ता को जानने के बाद औद्यौगिक नीति में बदलाव लाते हुए इन्हें भी बढ़ावा दिया गया। जिसने नब्बे के दशक के अंत में वैश्वीकरण के आगमन के बाद गति पकड़ी। जो देश पिछड़े देशों की श्रेणी में खड़ा था, देशवासियों की उद्यमशीलता एवं सरकारी प्रोत्साहन के कारण औद्योगिक एवं तकनीकी क्षेत्र में लंबी छलांग लगाई। इस कारण आज भारत विश्व की चुनींदा अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में ऊपरी पायदान पर है। इसमें “मेक इन इंडिया’, ‘स्किल इंडिया’ तथा ‘ओ डी ओ पी (एक जिला एक उत्पाद’ की महत्वपूर्ण भूमिका है।

विकास की रफ्तार के तेजी पकड़ने के साथ ही प्राकृतिक संसाधनों का अवैज्ञानिक दोहन आरंभ हुआ। शहरों के बेतरतीब फैलाव, गाँवों से नगरों को पलायन ने शहरों में सामाजिक सुविधाओं को ध्वस्त कर दिया जिससे से प्रदूषण की गंभीर समस्या उत्पन्न हुई और इससे निजात पाने के प्रयास जारी हैं। शहरों में बढ़ती आबादी के कारण निम्नवर्ग तथा मध्यम वर्ग के सामने आवास, पानी, बिजली एवं स्वास्थ्य सेवाओं की कमी की समस्या भी उठ खड़ी हुई। जिसके समाधान के प्रयास हर स्तर पर जारी हैं। इस दिशा में ‘उज्ज्वला योजना, हर घर बिजली, नल से जल ओ डी एफ, फसल बीमा’ जैसी योजनाओं के माध्यम से जीवन स्तर में व्यापक सुधार हुआ है। ‘सुकन्या समृद्धि योजना, बेटी बचाओ- बेटी पढ़ाओ, आयुष्मान भारत तथा जन-धन खाते” जैसे कार्यक्रमों से समाज के निचले तबके के लोगों को निश्चय ही राहत पहुँची है।

विगत आठ दशकों में परिवहन क्षेत्र में व्यापक परिवर्तन एवं सुधार हुए हैं। बैलगाड़ी आधारित प्रणाली आज टेम्पो / टैक्सी, उन्नत रेलवे, मेट्रो, वातानुकूलित बसें, हल्के तथा भारी व्यावसायिक वाहन, जल तथा वायु परिवहन में बदल चुकी है। वास्तव इस क्षेत्र में उल्लेखनीय दृष्टव्य प्रगति हुई है। इसी के समानांतर अंतरिक्ष विज्ञान, रॉकेट / मिसाइल तकनीक का दुनिया भी लोहा मानती है। संचार क्षेत्र भी इस दिशा में पीछे नहीं रहा। जिससे जन जन के हाथ में मोबाइल / स्मार्टफोन आ गये तथा जन-जन का प्यारा ‘डाकिया’ अब लुप्तप्राय हो गया। उपग्रह आधारित संचार प्रणाली से टेलीविजन घर-घर पहुँचा तथा गुजरे जमाने के सिनेमाघरों का स्थान मल्टीप्लेक्स ने ले लिया। इनके साथ ही बाजारों का स्वरूप ही बदल गया। कोने की किराने की दुकानों के साथ-साथ सुपर स्टोर और मॉल भी आ गए। अतः यह कह सकते हैं कि देश ने मूलभूत क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की तथा इस दिशा में और भी बहुत कुछ करना है।

देश में आर्थिक एवं औद्योगिक बदलाव के साथ एक चीज और बदली वह बहुत संतोषजनक नहीं है। वो है सामाजिक बदलाव। जहाँ एक ओर कई सामाजिक रूढ़ियों का अंत हुआ तो कई अन्य सामाजिक समस्याओं तथा विसंगतियों का उद्भव हुआ। संयुक्त परिवार एकल परिवार में बदले। सामुदायिक सोच में “हम” का स्थान “मैं” ने ले लिया। राजनीतिक कारणों से देश को धर्म-जाति के आधार पर ध्रुवीकृत करने का जो सिलसिला आरंभ हुआ वो अब और भी मुखरित हो उठा है। समरसता पूर्ण सामाजिक ढांचे का स्थान असहिष्णुता ने ले लिया जिसके दर्शन बात-बात में दंगे-फसाद के रूप में होते रहते हैं और ये “मेरा भारत महान” की सोच को चोट पहुँचाते हैं। आज आवश्यकता है कि दलगत राजनीतिक सोच से उठकर राष्ट्रीय हित में काम करने की ताकि देश विश्व को सही अर्थों में समग्र एवं सक्षम नेतृत्व दे सके।

Author