चारधाम यात्रा - आपके अनुभव को बना देगी यादगार

अरविन्द त्रिपाठी
देवभूमि उत्तराखंड की “चारधाम यात्रा”, जब तक आप यह पत्रिका पढ़ रहे होंगे तब तक प्रारम्भ हो चुकी होगी।

उत्तराखंड अपने कई प्राचीन मंदिरों के लिए जाना जाता है। देश के अलग-अलग क्षेत्रों से वर्षपर्यन्त श्रद्धालु राज्य के कई मंदिरों में दर्शन के लिए जाते हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण है “चारधाम यात्रा”, जिसकी एक लंबी योजना श्रद्धालु करते हैं। यह सभी धाम उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र में ऊँचाई पर स्थित हैं।

ऊँचाई वाले क्षेत्रों में स्थित ये मंदिर सर्दियों की शुरुआत के साथ बंद हो जाते हैं और लगभग छह महीने तक बंद रहने के बाद गर्मियों की शुरुआत अप्रैल – मई में खोल दिये जाते हैं। इस वर्ष 2026 में 19 अप्रैल को यमुनोत्री धाम व गंगोत्री धाम के कपाट खुलने के साथ चारधाम यात्रा शुरू हो चुकी है। 22 अप्रैल को केदारनाथ धाम और 23 अप्रैल को बद्रीनाथ धाम के कपाट भी खुल चुके हैं।

ऐसी मान्यता है कि “चारधाम यात्रा” को घड़ी की सुई की दिशा में पूरा करना चाहिये। इसलिए इसकी शुरुआत यमुनोत्री धाम से होती है। इसके बाद श्रद्धालु क्रमशः गंगोत्री धाम, केदारनाथ धाम के दर्शन करते हुए बद्रीनाथ धाम जाते हैं और वहाँ पूजा अर्चना करने के बाद ये यात्रा समाप्त हो जाती है।

यमुनोत्री धाम— चारधाम यात्रा यमुनोत्री धाम से प्रारम्भ होती है। यमुना जी के उद्गम स्थल के समीप स्थित इस मंदिर तक पैदल, घोड़े या पालकी से पहुंचा जा सकता है। यह मंदिर समुद्र तल से 3233 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। यह स्थान उत्तरकाशी ज़िले में है। ऋषिकेश से यमुनोत्री धाम की दूरी लगभग 210 किमी है।

गंगोत्री धाम— यात्रा का दूसरा पड़ाव गंगोत्री मंदिर भी उत्तरकाशी ज़िले में स्थित है। यह स्थान ऋषिकेश से लगभग 250 किमी की दूरी पर स्थित है। गंगोत्री धाम भारत के सबसे ऊँचे धार्मिक स्थलों में से एक है, जो समुद्र तल से 3415 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है।

गंगा नदी के उद्गम स्थल को “गोमुख” कहा जाता है, जो कि गंगोत्री मन्दिर से लगभग 19 किमी दूर गंगोत्री ग्लेशियर में स्थित है।

“गोमुख” से निकलने के बाद गंगा नदी को भागीरथी कहा जाता है, और जब यह देवप्रयाग के निकट “अलकनंदा नदी” से मिलती है तब यह गंगा नदी “बन जाती है।

केदारनाथ धाम— केदारनाथ धाम उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग ज़िले में स्थित है जो कि समुद्र तल से 3584 मीटर की ऊँचाई पर गढ़वाल क्षेत्र में पड़ता है। ऋषिकेश से केदारनाथ धाम की दूरी लगभग 227 किमी है।

केदारनाथ मंदिर तक पहुँचने के लिये 18 किमी की ट्रैकिंग करनी होती है। यहाँ पालकी और घोड़े के सहारे भी आप मंदिर तक पहुँच सकते हैं या बुकिंग करके हेलीकॉप्टर से भी यात्रा कर सकते हैं।

केदारनाथ मंदिर को हिंदुओं के पवित्र धामों में से एक माना जाता है। हिंदू धार्मिक ग्रंथों में जिन बारह ज्योतिर्लिंगों का उल्लेख है, केदारनाथ ज्योतिर्लिंग उनमें सबसे ऊँचाई पर स्थित ज्योतिर्लिंग है। केदारनाथ मन्दिर के पास मंदाकिनी नदी बहती है। यह मंदिर लगभग 1000 वर्ष पुराना बताया जाता है। जिसे चतुर्भुजाकार आधार पर पत्थर की बड़ी बड़ी शिलाओं से बनाया गया है।

बद्रीनाथ धाम — चारधाम यात्रा का आख़िरी पड़ाव बद्रीनाथ धाम है, जोकि समुद्रतल से 3100 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। यह मन्दिर अलकनंदा नदी के किनारे गढ़वाल में स्थित है। ऐसा माना जाता है कि आदि शंकराचार्य ने आठवीं सदी में इसकी स्थापना की थी। यह मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है।

उत्तराखंड की यह चारधाम यात्रा आस्था का बड़ा केन्द्र मानी जाती है, पर यह धामों तक पहुंचने भर की यात्रा नहीं है। इन रास्तों में ऐसे अनेक पड़ाव हैं, जो इस यात्रा को समृद्ध करते हैं। केदारनाथ धाम की ओर बढ़ते हुए त्रियुगीनारायण व चौराबाड़ी ताल जैसे स्थल जहां इतिहास और आस्था का संगम दिखाते हैं, वहीं भैरवनाथ मंदिर और रुद्र गुफा आत्मिक शांति का अनुभव प्रदान कराती हैं।

बद्रीनाथ धाम के मार्ग पर औली, ज्योतिर्मठ व बामणी गांव प्रकृति व लोकसंस्कृति की जीवंत झलक प्रस्तुत करते हैं, तो भारत का प्रथम गांव “माणा” व “वसुधारा” जलप्रपात ट्रैक, यात्रा को एक अलग आयाम देते हैं। यदि श्रद्धालु इन पड़ावों को समझते हुए रुक रुककर यात्रा करें, तो चारधाम यात्रा केवल दर्शन नहीं बल्कि एक विशेष आध्यात्मिक अनुभूति में भी प्रवर्तित हो सकती है।

ऊँचे ऊँचे पहाड़, जंगल, हिमाच्छादित चोटियाँ और गहरी सर्पाकार घाटियों से कल कल आगे बढ़ती नदियाँ यात्रा को रसमय बना देती हैं।

बरकोट — बरकोट चारधाम यात्रा का प्रथम पड़ाव है, जहां इतिहास, संस्कृति और परंपरा के दर्शन होते हैं। उत्तरकाशी जिले में स्थित यमुनोत्री धाम को बरकोट होते हुए ही पहुँचा जाता है। बरकोट के आसपास यमुना नदी के किनारे लाखामंडल, थानगांव, गंगनानी, तिलाड़ी का मैदान, यमुना जी का शीतकालीन प्रवास स्थल “खरसाली” और गुलाबी कांठा जैसे पर्यटन स्थलों की सैर की जा सकती है। ख़ासकर गुलाबी कांठा आनन्द की अनुभूति कराने वाला बुग्याल है।

मुखवा गांव — यात्रा का दूसरा पड़ाव गंगोत्री धाम है। गंगोत्री से 33 किमी दूर माँ गंगा जी का शीतकालीन प्रवास स्थल मुखवा गांव है। यहाँ पर भैरो घाटी, हर्षिल, केदारताल, नन्दन वन, चीड़बासा, भोजवासा आदि मनोरम स्थलों की भी सैर कर सकते हैं।

गर्तांगली — ऐतिहासिक गर्तांगली जाने के लिए गंगोत्री धाम से 12 किमी पहले लंका पहुंचना होगा। लंका से ढाई किमी की दूरी पर “जाड़गंगा” घाटी में गर्तांगली है। वर्ष 1962 से पहले भारत – तिब्बत के बीच व्यापारिक गतिविधियों के संचालन को गर्तांगली ही एक मात्र मार्ग हुआ करता था।

त्रियुगीनारायण मन्दिर — यात्रा के तीसरे पड़ाव केदारनाथ धाम से कुछ दूर चौराबाड़ी ताल की सैर भी आप कर सकते हैं, जो केदारघाटी की तबाही का कारण बनी थी। केदारनाथ धाम से लौटते समय सोनप्रयाग से त्रियुगीनारायण जी के दर्शन यात्रा को यादगार बना देगी। मान्यता है कि यहाँ पर भगवान शिव – पार्वती परिणय सूत्र में बंधे थे।

माणा गांव — देश का प्रथम गांव “माणा” बद्रीनाथ धाम से 4 किमी आगे चीन की सीमा पर स्थित है। बद्रीनाथ से वापसी में बद्रीनाथ धाम के शीतकालीन गद्दी स्थल भगवान नृसिंह के दर्शन (जोशीमठ) कर सकते हैं। विश्व प्रसिद्ध स्कीइंग स्थल “औली“ की सैर की जा सकती है।

चारधाम यात्रा सामान्यतः अप्रैल- मई से अक्टूबर- नवंबर तक चलती है। सबसे पहले यात्रा पंजीकरण कराना अनिवार्य होता है। जिसके लिए आधिकारिक वेबसाइट touristcare.uk.gov.in या http://tourism.uk.gov.in या Tourist care “Uttarakhand” ऐप का उपयोग कर सकते हैं। हरिद्वार के ऋषिकुल मैदान में 20, ऋषिकेश के ट्रांजिट कैंप में 24 और ISBT में 6 पंजीकरण काउंटर खोले गये हैं। अगर आप ऑनलाइन पंजीकरण नहीं कर सकते हैं तो हरिद्वार और ऋषिकेश के ऑफ़लाइन काउंटरों पर जाकर भी करवा सकते हैं।

किन बातों का रखें ध्यान — प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु चारधाम की यात्रा करते हैं। ऐसे में अगर आप पहले से गाड़ी, होटल और अन्य चीजों की प्लानिंग करेंगे तो यात्रा में आसानी होगी। इस यात्रा के लिए यात्रा पंजीकरण कराना अनिवार्य है। पंजीकरण की सुविधा ऑनलाइन और ऑफ़लाइन दोनों माध्यमों से उपलब्ध है।

  1. यात्रा पंजीकरण की कम से कम पांच छाया प्रतियां अपने साथ रखें।
  2. यात्रा में जाने से पहले वैध पहचान पत्र जैसे आधार कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस या पासपोर्ट अवश्य रख लीजिये।
  3. अगर आप किसी प्रकार की दवाई ले रहे हैं तो वो साथ रखें।
  4. गर्म कपड़े और आरामदायक जूते आदि अवश्य अपने साथ रखें।
  5. अपनी यात्रा प्रातः 5 बजे अवश्य प्रारंभ कर दें।
  6. भीड़ भाड़ से बचने के लिये मई- जून की जगह सितंबर- अक्टूबर में यात्रा करना बहुत अच्छा हो सकता है।

चारधाम यात्रा की आइटनरी कुछ इस प्रकार होती है—
हरिद्वार से हरिद्वार…….

दिन- 1 – हरिद्वार से बरकोट (185 किमी, 7-8 घंटे)
प्रातः हरिद्वार से प्रस्थान करिये। शाम तक बरकोट पहुँचकर होटल में चेक- इन करके रात्रि विश्राम करें।

दिन -2 – बरकोट से यमुनोत्री धाम दर्शन और वापसी (ड्राइव 36 किमी + 6 किमी ट्रैक, कुल 10-12 घंटे)
प्रातः जल्दी से जल्दी बरकोट होटल से जानकी चट्टी के लिये प्रस्थान करें। जानकी चट्टी से यमुनोत्री धाम तक 6 किमी का ट्रैक करिये या ट्रैक करने में असमर्थ हैं तो पालकी या घोड़े की सवारी कर जा सकते हैं।
यमुनोत्री धाम पहुँचकर यमुना जी के दर्शन, सूर्य कुंड में गर्म जल में स्नान और यमुना जी की दिव्य पूजा अर्चना करें। शाम तक बरकोट वापस आकर होटल में रात्रि विश्राम करें।

दिन -3 – बरकोट से उत्तरकाशी (80 किमी, 4-5 घंटे)
प्रातः ब्रेकफास्ट करके बरकोट से उत्तरकाशी के लिए प्रस्थान करे। रास्ते में प्राचीन काशी विश्वनाथ मंदिर में दर्शन करें।
उत्तरकाशी पहुँचकर होटल में चेक इन करके रात्रि विश्राम करें।

दिन- 4 – उत्तरकाशी से हर्षिल (70 किमी, 6-7 घंटे)
उत्तरकाशी से प्रातः प्रस्थान करके इनरूट सेब के बागान देखते और खाते हुए हर्षिल मध्याह्न तक पहुँचिये। थोड़ी देर विश्राम करने के बाद पास ही स्थित बागोरी गांव का भ्रमण कीजिये और हर्षिल घाटी के नजारे देखिये।

दिन-5- हर्षिल से गंगोत्री धाम और उत्तरकाशी वापस (30 किमी जाना और 100 किमी वापस, कुल 10-12 घंटे)
प्रातः हर्षिल के नजारे लेते हुए भागीरथी नदी के किनारे स्थित गंगोत्री धाम के लिए प्रस्थान करें। गंगोत्री मंदिर के घाट पर भागीरथी नदी में स्नान और माँ गंगा का पूजन करें, तत्पश्चात गंगोत्री मन्दिर में गंगा माँ के दर्शन और भगीरथ शिला आदि का दर्शन कीजिये।
गंगोत्री धाम से वापसी में रास्ते पर भैरव जी के दर्शन और गंगनानी में हॉट वॉटर स्प्रिंग देखिये। शाम तक उत्तरकाशी पहुंचकर होटल में रात्रि विश्राम करें।

दिन- 6 – उत्तरकाशी से गुप्तकाशी (220 किमी, 9-10 किमी)
प्रातः उत्तरकाशी से गुप्तकाशी के लिए प्रस्थान कीजिये। रास्ते में रुद्रप्रयाग संगम के दर्शन और प्राकृतिक सौंदर्य के नजारे लेते हुए शाम तक गुप्तकाशी पहुँचकर होटल में रात्रि विश्राम करें।

दिन -7 – गुप्तकाशी से केदारनाथ मंदिर (30 किमी ड्राइव +22 किमी ट्रैक, कुल 10-12 घंटे)
प्रातः सीतापुर / सोनप्रयाग के लिए प्रस्थान करें। जो भी श्रद्धालु पैदल, घोड़े या पालकी से केदारनाथ धाम जाना चाहते हैं, वे लोग पहले सोनप्रयाग से गौरीकुंड पहुंचे और फिर वहाँ से 18 किमी का ट्रैक कीजिये या घोड़े और पालकी से केदारनाथ धाम पहुँचिये।
जिन श्रद्धालुओं ने हेलीकॉप्टर बुक किया है वे “फाटा” में रात्रि विश्राम करें। सुबह जिस भी हैलीपैड से उनकी बुकिंग है, वहाँ पर अपने स्लॉट (दिये गए समय) से पहले पहुंच जाएँ।
हैलीकाप्टर की बुकिंग वाले यह ध्यान रखें कि स्लॉट 6-9, 9-12,12-3 और 2-5 बजे के रहते हैं। अगर आपको प्रातः 6-9 और 9-12 का स्लॉट चुना है, तो उसी दिन केदारनाथ धाम से फाटा वापस आना होगा।
अगर आप केदारनाथ धाम में रुकना चाहते हैं तो दोपहर 12 बजे के बाद का स्लॉट चुनिये। इसमें आपकी वापसी अगले दिन प्रातः होगी।
जो श्रद्धालु ट्रैक करके या घोडे और पालकी से जा रहे हैं वो केदारनाथ धाम में बाबा केदारनाथ के दर्शन करने के साथ-साथ मन्दिर में रात्रि आरती के दर्शन कर सकते हैं। केदारनाथ धाम में रात्रि विश्राम करें।
जो श्रद्धालु अगले दिन स्पर्श दर्शन करना चाहते हैं, तो रात में ही सभी साथियों के आधार कार्ड दिखाकर काउंटर से विशेष पास बनवा लें।

दिन- 8– केदारनाथ मंदिर में दर्शन और सीतापुर / सोनप्रयाग के लिए वापसी
प्रातः 3 बजे स्पर्श दर्शन और पूजन प्रारम्भ हो जाता है इसलिए शीघ्रातिशीघ्र उठकर, स्नान करके मन्दिर पहुंच कर लाइन में खड़े हो जाएँ। बाबा केदारनाथ के दिव्य स्पर्श दर्शन पूजन में समय लगेगा इसलिए क़तार में धैर्यपूर्वक चलते रहिये। स्पर्श दर्शन पूजन के पश्चात आप भैरों जी जा सकते हैं, जहाँ पर जाने आने में मात्र एक घंटा लगेगा, जोकि एक किलोमीटर की चढ़ाई पर स्थित है। चाहे तो पहले चाय- चुई करके फिर भैरों जी के दर्शन के लिये जाए। भैरों जी के दर्शन के बाद वापस आकर बाबा केदारनाथ मन्दिर के पीछे शिला और आदि शंकराचार्य कुंड आदि के दर्शन करें।
केदारनाथ धाम से ट्रैक करके सोनप्रयाग/ सीतापुर या गुप्तकाशी के लिए वापसी करें। इसमें कुल 9-10 घंटे लगेंगे।

दिन- 9 – गुप्तकाशी से बद्रीनाथ धाम (195 किमी, 8-9 घंटे)
अगर आप चोपता तुंगनाथ होकर बद्रीनाथ जाते हैं तो रास्ते में हरी भरी घाटियों के नजारों का आनंद लें। शाम तक बद्रीनाथ धाम पहुँचकर होटल में चेक- इन करें और अविलम्ब मन्दिर पहुंचकर शाम की आरती, दर्शन और कीर्तन का आनंद लें।

दिन- 10 – बद्रीनाथ धाम में स्नान, दर्शन, माणा गांव और वापसी
प्रातः गर्म कुंड के जल से स्नान करने के बाद भगवान बद्रीनाथ जी के दर्शन करें। उसके बाद ब्रेकफास्ट करके होटल से चेक- आउट करें। इसके बाद प्रथम गांव माणा का भ्रमण करते हुए सरस्वती नदी, गणेश मन्दिर और व्यास मन्दिर में दर्शन करें। माणा गांव से पांडवों द्वारा स्वर्ग की ओर जाने वाले सत्यपथ का अवलोकन करें।
माणा गांव से रुद्रप्रयाग आकर रात्रि विश्राम करें। रास्ते में नृसिंह मंदिर, जोशीमठ में दर्शन करें।

दिन- 11– रुद्रप्रयाग से हरिद्वार
प्रातः रुद्रप्रयाग में अलकनंदा नदी और मंदाकिनी नदी का संगम देखें। रास्ते में “धारी देवी” के दर्शन करते हुए शाम तक ऋषिकेश / हरिद्वार वापस आ जायेंगे।

खाने और ठहरने की सुविधा
चारधाम के स्थलों और पड़ावों पर होमस्टे, होटल व धर्मशालाओं में ठहरने की सुविधा उपलब्ध है, लेकिन बेहतर होगा कि पहले से बुक करा कर जाएँ।
यहाँ पारंपरिक स्थानीय व्यंजन मंडुवे की रोटी, आलू के गुटखे, पहाड़ी राजमा, साग, झंगोरे की खीर आदि का स्वाद ले सकते हैं।

कैसे पहुँचे—
हेलीकाप्टर सेवा– चारधाम के लिये देहरादून से हेलीकॉप्टर सेवा उपलब्ध रहती है।
वायु मार्ग द्वारा- देहरादून, ऋषिकेश और हरिद्वार तक हवाई जहाज़ से यात्रा करने के लिये निकटतम हवाई अड्डा जॉली ग्रांट एयरपोर्ट, देहरादून है।
रेल मार्ग द्वारा– देश के प्रमुख शहरों से हरिद्वार, ऋषिकेश और देहरादून के लिये

नियमित ट्रेनें चलती हैं।
सड़क मार्ग द्वारा- देश के चारों ओर से हरिद्वार, ऋषिकेश और देहरादून पहुंचने के लिए बहुत बढ़िया सड़कों का

निर्माण किया गया है, जहां से बस, टैक्सी, निजी वाहन या टूर ऑपरेटर्स द्वारा संचालित वाहनों और पैकेज से “चारधाम यात्रा” प्रारम्भ कर सकते हैं।

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