आधुनिक पोषण काविरोधाभास

“हमदर्द”, कोलकाता
शहर के पॉश कॉलोनी में रहने वाला रोहित खुद को बहुत आधुनिक मानता था। ब्रांडेड कपड़े, महँगा मोबाइल, दोस्तों की महफ़िल और सोशल मीडिया की चमक — यही उसकी दुनिया थी। उसे लगता था कि ज़माना बदल गया है, अब पुराने संस्कारों की कोई ज़रूरत नहीं। माँ-बाप की बातें उसे बोझ लगती थीं।
रोहित की शादी नेहा से हुई। नेहा भी आधुनिक सोच वाली थी। शादी के बाद घर में माँ-पिता की जगह धीरे-धीरे साला, साली, साढ़ू और दोस्तों का आना-जाना बढ़ गया। हर वीकेंड पार्टी होती, हँसी-ठिठोली गूँजती, लेकिन उसी घर के एक कोने में रोहित के बूढ़े माँ-बाप चुपचाप बैठे रहते।
माँ कई बार कहती, — “बेटा, कभी हमारे साथ भी बैठ जाया करो, दो शब्द बोल लिया करो…” रोहित हँसकर टाल देता,
“माँ, आप पुरानी बातें करती हैं, आजकल सब अपने-अपने में बिज़ी रहते हैं।”
पिता की आँखों में हर दिन एक नई उदासी उतर आती। जिस बेटे को उन्होंने अपनी जवानी, अपनी कमाई, अपना सपना सब सौंप दिया था, वही आज उन्हें समय देना भी जरूरी नहीं समझता था।
एक दिन पिता की तबियत अचानक बिगड़ गई। साँस तेज़ चलने लगी, सीने में दर्द उठने लगा। माँ घबराकर रोहित को बुलाने दौड़ी।
रोहित फोन पर दोस्तों से बात कर रहा था। बोला, — “अभी नहीं माँ, जरूरी मीटिंग है। साला जी को कहो अस्पताल ले जाएँ।”
साला आया, लेकिन रास्ते में ट्रैफिक, फोन कॉल, लापरवाही — सब मिलकर देर हो गई। अस्पताल पहुँचते-पहुँचते पिता ने दम तोड़ दिया।
शमशान की अग्नि के साथ रोहित का अहंकार भी जल रहा था। पिता का शांत चेहरा उसे भीतर तक झकझोर रहा था। वही हाथ जिसने उसे चलना सिखाया था, आज हमेशा के लिए ठंडे हो चुके थे।
तेरहवीं के बाद सभी रिश्तेदार चले गए। दोस्त भी धीरे-धीरे गायब हो गए। वही घर, वही दीवारें — पर अब सन्नाटा बोल रहा था। माँ कोने में बैठकर पिता की तस्वीर से बातें करती रहती।
एक रात माँ रोते हुए बोली, — “बेटा, अगर तुम्हारे पापा को समय पर अस्पताल मिल जाता, तो शायद आज वो ज़िंदा होते…”
यह वाक्य रोहित के सीने में तीर बनकर चुभ गया। उसे पहली बार समझ आया कि आधुनिकता के नाम पर उसने सबसे कीमती रिश्ता खो दिया।
अगले दिन उसने माँ के पैर पकड़कर कहा,
“माँ, मुझे माफ़ कर दो… मैंने रिश्तों की पहचान बहुत देर से समझी।”
अब रोहित ने अपना जीवन बदल लिया। उसने माँ को अपने जीवन का केंद्र बना लिया। दोस्तों की भीड़ छँट गई, पर माँ की दुआओं ने उसका घर फिर से रोशन कर दिया।
वह अब सबको एक ही बात कहता है
“दोस्त, साला-साली, दुनिया सब बाद में आते हैं…
माँ-बाप पहले होते हैं।
जो उन्हें खो देता है, वह पूरी दुनिया पाकर भी खाली रह जाता है।”
सारांश :—
आधुनिकता अच्छी है, लेकिन संस्कारों के बिना वह खोखली होती है। माँ-बाप का सम्मान, समय और सेवा जीवन की सबसे बड़ी पूँजी है। रिश्तों की असली पहचान देर से नहीं, समय रहते कर लेनी चाहिए।
