हे प्रिय !बस थोडा पढ लेना !
प्रो. उदय प्रताप सिंह, कानपुर
जब पलकें बोझिल हो जायें
अश्रु न जब धीरज रख पायें
मौन मुखर होकर जब बोले
शब्द सभी अवकाश मनायें
मुझे स्मरण तब कर लेना
साथ जिएंगे हम उस पल को।
हे प्रिय! बस थोड़ा पढ़ लेना
मेरे इस अंतस्तल को ॥1॥
चुभे हृदय में जब कोलाहल
मन: भाव भी साथ न दें जब
भीड़ लिए हो जब सूनापन
अपने भी विश्वास न दें जब
टूटे सपनों की किरचों को
तुम यूँ मत बिखराने देना,
आहत मन की हर पीड़ा को
आँसू में बह जाने देना।
शब्दहीन भाषा में ढलकर
मैं बनकर स्वर आ जाऊँगा
और सजा दूंगा भावों से
एक एक विह्वल क्षण को।
हे प्रिय! बस थोड़ा पढ़ लेना
मेरे इस अंतस्तल को ॥2॥
संबंधों की हर परिभाषा
गहन स्वार्थ में सिमट चले जब
मृदु मुस्कानों की छाया में
कटुता मन में पले बढ़े जब
जब संवेदना वस्त्र बन जाये
अन्तर में छल-कपट छिपाये
मेरी कविता तुम पढ़ लेना
अवतल दर्पण बन जायेगी
हर पीड़ा उर से हर लेगी
शान्ति-सुधा क्षण क्षण लायेगी।
जो तुमसे मै कह न पाया
कह देगी यह हृदय सबल को।
हे प्रिय! बस थोड़ा पढ़ लेना
मेरे इस अंतस्तल को ॥3॥
रात विरह की जब गहराये
नींद तुम्हारी जब रूठी हो
चाँद छल रहा हो जब तुमको
तारों की आभा झूठी हो।
पेड़ों के झुरमुट जब तुमको
द्वेष भाव में लगें चिढ़ाने
मंद मंद बह रही पवन जब
शून्य, अचेतन लगे बढ़ाने
तब मेरे शब्दों की ऊष्मा
ऊर्जा बनकर आ जायेगी
सूखे मन के बगिया में यह
हरियाली बन छा जायेगी।
तुम बस वरना शुद्ध समर्पण
जैसे निर्झरिणी सागर को।
हे प्रिय! बस थोड़ा पढ़ लेना
मेरे इस अंतस्तल को ॥4॥
