सहजन के फूल

कोलकाता
फरवरी 2025 में हम लोग (मैं और मेरी श्रीमती जी) लखनऊ से गाजियाबाद के लिए तेजस एक्सप्रेस से वापसी की यात्रा के लिए प्रस्थान किये। गाड़ी अपने सही समय प्रातः 6:10 पर चारबाग स्टेशन के लिए रवाना हुई। ब्रह्म मुहूर्त में मन प्रफुल्लता से परिपूर्ण था, खिड़की के किनारे मेरी सीट थी ट्रेन की गति के साथ मन भी गतिमान हो उठा, भगवत भजन मैं मन ही मन गुनगुनाने लगा। सहसा मेरी दृष्टि रेलवे लाइन के किनारे बसे घरों की ओर गई और मैंने प्रायः हर घर की चारदीवारी पर लगे सहजन के पेड़ देखे, प्रायः हर पेड़ पुष्पित एवं खिले हुए दिखे और ऐसे दृश्यों को देखकर मन रचनात्मक हो उठा अतः मेरी मानसिक लेखनी चल पड़ी।
बसन्त की प्रथम आहट के साथ ही सहजन के पेड़ ने अपनी शाखाओं को नव जीवन के प्रकाश से भर लिया। हल्की ठंडी हवा, धूप की परछाइयां और कोयल की आवाज के बीच सहजन के फूल अपनी कोमल पंखुड़ियों को खोलने लगे। इन फूलों में एक अलौकिक सादगी है जैसे किसी गीत का पहला मुखड़ा – अनायास लेकिन भीतर तक स्पंदित कर देने वाला। इन छोटे छोटे सफेद फूलों में स्मृतियों का एक सागर बसता है। गांव की वह पगडंडी, जहां दुपहरिया की उनींदी हवा में सहजन की डालियां झूलती हैं। उनकी छांव में खेलते बच्चे, दोपहर की थकान से आँखें मूंदकर सुस्ताते किसान और किसी कोने में बैठी कोई स्त्री, जो फूलों को बटोरकर उनकी सब्जी बनाने की सोच रही है। सहजन का फूल केवल फूल नहीं है वह किसी विरासत की तरह अगली पीढ़ी को सौंपा जाने वाला एक गीत है – मौन में गाया हुआ, लेकिन हृदय के अन्दर तक गूंजता हुआ।
सहजन के फूल को जब पानी में डुबोया जाता तो वो अपनी कोमलता को त्याग कर पकने के लिए तैयार हो जाते। जैसे जीवन भी तपने पर ही अपनी पूर्णता को प्राप्त करता है। उनकी हल्की कड़वाहट, उनकी मिट्टी की गंध और उनके भीतर बसी हुई मृदुता एक सम्पूर्ण कविता है – जिसे मात्र स्वाद ही नहीं, अपितु हृदय से भी समझा जा सकता है| सहजन के फूलों की एक अलग ही दुनिया है – न धूमधाम, न रंगों का जादू, बस सफेदी में लिपटी हुई एक गहरी अनुभूति। ये ऐसे शब्दों की तरह हैं जो बिना किसी ध्वनि के भी अंतर्मन तक प्रभावित कर जाते हैं। उनके गिरने का ढंग भी अनोखा है, धीरे – धीरे बूँद – बूँद की तरह, मानों समय के हाथों अपनी अंतिम आहुति दे रहें हों।
जब हवा सहजन के फूलों का स्पर्श करती तो वे एक अनकही भाषा में झूम उठते। यह भाषा किसी एक की नहीं, यह उन सभी की है, जिन्होंने प्रतीक्षा की पीड़ा को समझा है। एक विरहिणी नायिका की तरह ये फूल अपनी डालियों से अलग होकर भी किसी अदृश्य प्रेम के साथ जुड़े रहते हैं। सहजन के फूलों में प्रेम है, एक ऐसा प्रेम, जो सब कुछ सहकर भी विनम्र बना रहता है। कभी – कभी जब संध्या ढलती तो सहजन के फूलों से भरी डालियाँ चुपचाप अपने अस्तित्व को देखती रहती। जैसे किसी वृद्ध साधु की आँखों में ठहरा हुआ संतोष। वे फूल, जो दिनभर हवा के साथ हंसे थे, अब निःशब्द पड़े रहते – स्वीकृति और समर्पण के साथ। वे जानते हैं कि उनकी यात्रा यहीं समाप्त नहीं होती, वे मिट्टी में मिलकर पुनः जन्म लेंगे, किसी और शाखा पर, किसी और ऋतु में।
सहजन के फूलों की यही विशेषता है कि वे जीवन के सबसे सरल, सबसे अल्पकालिक, लेकिन सबसे अर्थपूर्ण हिस्सा हैं। वे बिना बोले हमें सिखा जाते हैं कि सौन्दर्य केवल भव्यता में ही नहीं, सादगी में भी होता है। वे हमें यह भी सिखाते हैं कि जो गिरने में भी आनन्द पा सके, वही सच्चे अर्थों में खिला हुआ है।
जब भी कोई सहजन के फूलों को देखता, उसे अपने अन्दर कोई भूला बिसरा गीत याद आ जाता। कोई पुरानी चिट्ठी, कोई अनकहा वादा, कोई अधूरा सपना। वे मात्र फूल नहीं हैं, वे स्मृतियों की छोटी – छोटी नावें हैं जो समय की नदी में बहती रहती हैं – शान्त, निश्चल, लेकिन हर किसी तक पहुंचने वाली। कई बार मैं सहजन के उन फूलों को देखता और सोचता कि क्या जीवन भी ऐसा नहीं है? क्या हम सब किसी शाखा पर लगे हुए फूल ही तो नहीं, जिन्हें एक दिन भूमि पर गिर जाना है? यदि गिरना ही नियति है तो क्यों न गिरते समय भी अपनी सुगन्ध को बचाए रखें? क्यों न इस यात्रा को भी सुन्दर बना दें?
शायद यही कारण है कि जब भी सहजन के फूल बिखरते, वे किसी उदासी में नहीं अपितु एक नृत्य में होते हैं। जैसे किसी विदा होती आत्मा की अंतिम प्रार्थना। जैसे किसी प्रेमी की वह चुप्पी, जिसमें कोई उलाहना नहीं मात्र समर्पण होता है।
सहजन के फूल केवल पेड़ पर नहीं खिलते हैं, वे माँ के हाथों में गरमाहट में खिलते हैं, वे किसी पुरानी धुन में खिलते हैं, वे हवा में बहते हैं, मिट्टी में घुलते हैं और पुनः किसी नए वृक्ष की शाखा पर उग आते हैं और इस प्रकार सहजन के फूल कभी – कभी मरते नहीं। वे बार – बार नए स्वरूप में लौटते हैं – उसी सादगी, उसी नमीं और उसी अव्यक्त सौंदर्य के साथ। सहजन के फूल चुपचाप खिलते हैं – जैसे किसी कविता की सबसे मृदु पंक्ति जो अर्थों के भार से झुकी हुई नहीं अपितु हलकी होकर हवा में बहती है। वे किसी भी ऋतु के प्रखर नायक नहीं होते, न वसंत के रंगों में खोये रहते हैं, न पतझड़ की उदासी को ओढ़ते हैं। वे बस आते हैं धीरे से, संकोच के साथ, जैसे किसी पुरानी धुन का पहला सुर, जिसे केवल वही सुन सकता है, जिसकी स्मृतियों में कोई शान्त धूप बची हो।
सहजन के फूलों की सादगी में एक अजीब सी जटिलता है। वे जितने सीधे दिखते हैं उतने ही गहरे होते हैं। सफेद, नर्म और हल्की गंध से भरे हुए ये फूल किसी मौन गीत की तरह खिलते हैं – शब्दों से अधिक अनुभव में बहते हुए। हवा उन्हें छूती है और बिना किसी प्रतिरोध के बहने लगते हैं। जैसे प्रेम में समर्पण का पहला क्षण, जब सब कुछ स्पष्ट नहीं होता लेकिन महसूस करना ही पर्याप्त होता है। सहजन के फूल गिरते नहीं – वे उतरते हैं। धीरे – धीरे, जैसे समय के स्पर्श से पिघलकर धरती की गोद में समा रहे हों। उनकी यात्रा किसी संत की प्रार्थना जैसी है – शान्त, कोमल, गंभीर एवम् गहरी। वे न अपने खिलने का उत्सव मनाते हैं, न गिरने की पीड़ा में विलीन होते हैं।
यद्यपि मेरा उद्देश्य मात्र सहजन के फूलों का वर्णन करने का था पर मैं इसे मात्र फूलों तक ही सीमित नहीं रख सकता क्योंकि सहजन का वृक्ष असीमित गुणों से भरपूर है और उन में से कुछ गुणों को मैं आपके साथ साझा करना चाहता हूँ:
सहजन (मोरिंगा) के पत्ते इम्यूनिटी बढ़ाते हैं, ब्लड शुगर नियंत्रित रखते हैं, और पाचन में सुधार करते हैं। यह विटामिन, आयरन और कैल्शियम का एक अद्भुत स्रोत है।
स्वास्थ्य लाभ:
• रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) : विटामिन सी और एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर होने के कारण यह शरीर को संक्रमण और बीमारियों से बचाते हैं।
• ब्लड शुगर कंट्रोल : इनमें मौजूद तत्व रक्त शर्करा के स्तर को कम करने और इंसुलिन की कार्यक्षमता सुधारने में सहायक होते हैं।
• पाचन क्रिया : फाइबर की मात्रा होने से कब्ज और पेट की समस्याएं दूर होती हैं तथा पाचन में सुधार होता है।
• हड्डियों की मजबूती : इसमें कैल्शियम और मैग्नीशियम प्रचुर मात्रा में होते हैं, जो हड्डियों को सुदृढ़ करते हैं।
• सहजन की फलियाँ (ड्रमस्टिक – Drumstick) (जो फूलों का ही अगला पड़ाव / रूप है) का उपयोग सांभर, सब्जी, और सूप बनाने में बहुतायत रूप से किया जाता है|





