सम्पादक की ओर से....

प्रदीप शुक्ल

अपने आप से करें सवाल

आज पूरा देश स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर उन असंख्य ज्ञात-अज्ञात शहीदों को श्रद्धापूर्वक स्मरण कर रहा है, जिनके त्याग, तपस्या और बलिदान से हमें स्वतंत्र भारत में सांस लेने का अधिकार मिला। यह दिन केवल उत्सव का अवसर नहीं, बल्कि आत्ममंथन और आत्ममूल्यांकन का भी दिन है। स्वतंत्रता के अमृतकाल में खड़े होकर जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं तो उपलब्धियों की एक लंबी और गौरवपूर्ण यात्रा हमारे सामने दिखाई देती है।

स्वतंत्रता प्राप्ति के समय विभिन्न चुनौतियां के साथ गरीबी, अशिक्षा, सीमित संसाधन सामाजिक विषमताएं हमारे विकास की राह में बड़ी बाधाएं थीं। इसके बावजूद देश ने न सिर्फ लोकतंत्र को मजबूत किया बल्कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी, कृषि और उद्योग तथा वैश्विक अर्थव्यवस्था में उल्लेखनीय प्रगति के साथ अंतरिक्ष से लेकर डिजिटल तकनीक तक, चिकित्सा से लेकर विनिर्माण तक और शिक्षा से लेकर उद्यमिता तक अपनी क्षमता का लोहा मनवाया है। सामरिक क्षेत्र में भी भारत निरंतर आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहा है। रक्षा उत्पादन, स्वदेशी तकनीक और आधुनिक सैन्य क्षमताओं के विकास ने देश की रणनीतिक शक्ति को नया आयाम दिया है। दुनिया के अनेक देशों में भारतीय डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, प्रबंधक और उद्यमी हर रूप में उपस्थित हो अपनी दक्षता और प्रतिभा से देश का नाम रोशन कर रहे हैं।

लेकिन किसी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति केवल इन मूल्यों पर निर्धारित नहीं होती। उसकी आत्मा उसकी संस्कृति, भाषा, परंपराओं, मूल्यों और सामूहिक स्मृति में बसती है और इसी क्षेत्र में हमें ठहरकर स्वयं से कुछ कठिन सवाल पूछने की आवश्यकता है। विकास और आधुनिकता का अर्थ अपनी सांस्कृतिक पहचान से दूरी बनाना कतई नहीं हो सकता। विदेशी कहलाये जाने की प्रवृत्ति, पहनावे से लेकर खान-पान तक, भाषा से लेकर जीवन-शैली तक के आकर्षण में सब कुछ बदलने की सोंच हमें निरंतर संस्कृति से दूर करती जा रही है और यही मानसिकता अपनी चीजों को बिना समझे ही कमतर मानने लगती है। संस्कृति कोई संग्रहालय में रखी हुई जड़ वस्तु नहीं है, संस्कृति निरंतर विकसित होने वाली जीवन-पद्धति है। दूसरी संस्कृतियों से सीखना, नए विचारों को स्वीकार करना और दुनिया के साथ कदम मिलाकर चलना प्रगति का स्वाभाविक हिस्सा है। लेकिन यह प्रक्रिया तभी सार्थक है जब उसमें आत्मविश्वास हो, आत्महीनता नहीं। मजबूत जड़ों वाला समाज ही परिवर्तन की आंधियों में स्थिर रह सकता है।

आज स्वतंत्रता दिवस पर हमें राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ मानसिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रता पर भी विचार करना चाहिए। अपनी भाषाओं का सम्मान, लोक परंपराओं का संरक्षण, भारतीय ज्ञान-विरासत की समझ, परिवार और समाज के मूल्यों के प्रति संवेदनशीलता तथा देश की विविध सांस्कृतिक धाराओं के प्रति सम्मान—ये सब हमारी राष्ट्रीय चेतना के महत्वपूर्ण आधार हैं।

आइए, इस स्वतंत्रता दिवस पर हम केवल तिरंगा फहराने और देशभक्ति के गीत गाने तक सीमित न रहें, अपितु ऐसा भारत बनाने का संकल्प लें जो आधुनिक भी हो और अपनी जड़ों से जुड़ा भी; विश्व के लिए खुला भी हो और अपनी पहचान के प्रति सजग भी। हमारी स्वतंत्रता तभी पूर्ण अर्थ प्राप्त करेगी, जब हम पराई श्रेष्ठता-बोध की मानसिक गुलामी से मुक्त होकर अपने सांस्कृतिक स्वाभिमान के साथ आगे बढ़ें और अपनी उपलब्धियों पर गर्व करने के साथ अपनी आत्मा को भी पहचाने।

धन्यवाद
प्रदीप शुक्ल

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