शिक्षा और परीक्षाओं की शुचिता: सुविधा, संस्कारहीनता या नैतिक दिवालियापन

राजकुमार जैन,
स्वतंत्र विचारक,
इंदौर

भारत के लिए 21वीं सदी की सबसे बड़ी परीक्षा UPSC, NEET, JEE या किसी विश्वविद्यालय की वार्षिक परीक्षा नहीं है। सबसे कठिन परीक्षा यह है कि क्या हम अपने बच्चों को सफलता से पहले सत्य का मूल्य सिखा पाएँगे? क्योंकि जिस समाज में प्रश्नपत्र बिकने लगते हैं, वहाँ केवल परीक्षाएँ नहीं टूटतीं—वहाँ राष्ट्र का नैतिक संविधान दरकने लगता है।

जब प्रश्नपत्र बिकने लगें, तो राष्ट्र का चरित्र असफल हो जाता है

एक सभ्यता का वास्तविक आकलन उसकी इमारतों, अर्थव्यवस्था या सैन्य शक्ति से नहीं, बल्कि इस प्रश्न से तय होता है कि वह अपने बच्चों को सफलता तक पहुँचने का कौन-सा मार्ग सिखाती है। क्या वह उन्हें परिश्रम, सत्य और आत्मसम्मान का रास्ता दिखाती है, या फिर यह संदेश देती है कि यदि पर्याप्त धन, संपर्क या अवसर मिल जाए तो ईमानदारी केवल आदर्शवादी लोगों के लिए बची हुई चीज़ है? भारत आज इसी चौराहे पर खड़ा है।

विश्व की सबसे युवा आबादी वाला देश, जो स्वयं को ज्ञान-आधारित महाशक्ति बनाने का सपना देख रहा है, उसी देश में हर परीक्षा के मौसम के साथ एक समानांतर अर्थव्यवस्था भी सक्रिय हो जाती है, प्रश्नपत्र लीक करने वालों, दलालों, खरीदारों और नैतिक दिवालियापन के कारोबारियों की अर्थव्यवस्था।

हम अक्सर इसे “परीक्षा घोटाला” कहकर भूल जाते हैं। वास्तव में यह शिक्षा का संकट नहीं, सभ्यता का संकट है।

यह केवल कानून का अपराध नहीं, विश्वास की हत्या है, हर प्रश्नपत्र लीक के बाद कुछ गिरफ्तारियाँ होती हैं, कुछ अधिकारी निलंबित होते हैं, परीक्षाएँ रद्द होती हैं और लाखों विद्यार्थी फिर से तैयारी में जुट जाते हैं। लेकिन इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा पीड़ित कोई समाचार शीर्षक नहीं बनता, वह है समाज का विश्वास।

विश्व बैंक, OECD और UNESCO वर्षों से इस बात पर बल देते रहे हैं कि किसी भी शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी पूँजी उसकी विश्वसनीयता होती है। जब नागरिकों को यह विश्वास नहीं रहता कि योग्यता का निष्पक्ष मूल्यांकन होगा, तब प्रतिभा का स्थान संपर्क, धन और छल लेने लगते हैं। यही वह क्षण होता है जब शिक्षा सामाजिक गतिशीलता (Social Mobility) का माध्यम न रहकर विशेषाधिकार का उपकरण बन जाती है।

प्रश्नपत्र लीक का नुकसान केवल उस परीक्षा तक सीमित नहीं रहता। उसका प्रभाव वर्षों तक प्रशासन, चिकित्सा, इंजीनियरिंग, न्यायपालिका, शिक्षा और शासन की गुणवत्ता में दिखाई देता है।

हमारी सार्वजनिक बहस अक्सर प्रश्नपत्र बेचने वाले गिरोहों तक सीमित रहती है। निस्संदेह वे अपराधी हैं। लेकिन एक असुविधाजनक प्रश्न पूछना आवश्यक है कि यदि कोई खरीददार न हो, तो क्या कोई प्रश्नपत्र बिक सकता है।

यहीं से यह मुद्दा अपराधशास्त्र से निकलकर नैतिक दर्शन का विषय बन जाता है। जब कोई अभिभावक अपने बच्चे के लिए चोरी का प्रश्नपत्र खरीदता है, तब वह केवल कानून नहीं तोड़ता। वह अपने ही बच्चे के चरित्र की पहली नींव में दरार डाल देता है। वह उसे यह सिखाता है कि सफलता का मूल्य सत्य से अधिक है और परिणाम का महत्व प्रक्रिया से बड़ा है। उस दिन बच्चा परीक्षा अवश्य पास कर सकता है, लेकिन जीवन की सबसे महत्वपूर्ण परीक्षा में असफल हो जाता है।

इस तरह संस्कारों की पहली पराजय घर में होती है, हम भारतीय समाज में “संस्कार” शब्द का अत्यधिक प्रयोग करते हैं। हम बच्चों को मंदिर ले जाते हैं, नैतिक कहानियाँ सुनाते हैं, सत्यवादी हरिश्चंद्र और महात्मा गांधी का स्मरण कराते हैं। लेकिन वही समाज यदि परीक्षा के समय यह कहने लगे कि “सब खरीद रहे हैं, तुम भी खरीद लो”, तो यह केवल दोहरे मानदंड नहीं, बल्कि संस्कारों का सार्वजनिक दिवालियापन है। सवाल यह नहीं कि बच्चा कितना पढ़ा। सवाल यह है कि उसने अपने माता-पिता से क्या सीखा। क्योंकि चरित्र कभी विद्यालय में शुरू नहीं होता; वह भोजन की मेज़, पारिवारिक संवाद और घर के छोटे-छोटे निर्णयों में आकार लेता है।

जापान ने तकनीक से पहले नैतिक शिक्षा को चुना। वहाँ प्राथमिक विद्यालयों में बच्चों को ईमानदारी, अनुशासन और सामूहिक उत्तरदायित्व सिखाया जाता है। परीक्षा में बेईमानी केवल नियम तोड़ना नहीं, सामाजिक सम्मान खोना माना जाता है। दक्षिण कोरिया की विश्वविद्यालय प्रवेश परीक्षा Suneung के दिन पूरा राष्ट्र परीक्षार्थियों के लिए अपनी गति धीमी कर देता है। विमान उड़ानों का समय बदला जाता है, कार्यालयों का समय समायोजित किया जाता है और समाज यह संदेश देता है कि प्रतिभा का सम्मान राष्ट्रीय दायित्व है। फ़िनलैंड ने शिक्षा व्यवस्था का आधार भय नहीं, विश्वास बनाया। वहाँ निगरानी से अधिक नैतिक स्वायत्तता पर बल दिया जाता है। बच्चों को प्रतिस्पर्धा से पहले सत्यनिष्ठा सिखाई जाती है।

इन देशों की सफलता केवल बेहतर पाठ्यक्रमों का परिणाम नहीं है; यह उनके नैतिक अनुबंध (Moral Contract) की सफलता है।

प्रश्न यह पूछा जाना चाहिए कि नकल से पास हुआ डॉक्टर किस तरह का इलाज करेगा, इस प्रश्न को भावनात्मक नहीं, व्यावहारिक दृष्टि से देखिए। यदि मेडिकल प्रवेश परीक्षा में बेईमानी करने वाला विद्यार्थी डॉक्टर बनता है, तो उसके निर्णयों की कीमत किसी रोगी का जीवन हो सकती है। यदि इंजीनियरिंग प्रवेश में धोखाधड़ी करने वाला अभियंता पुल बनाए, तो उसकी त्रुटि सैकड़ों परिवारों को प्रभावित कर सकती है। यदि प्रशासनिक सेवा में अयोग्यता प्रवेश कर जाए, तो उसका प्रभाव पूरे शासन तंत्र पर पड़ता है। यही कारण है कि परीक्षा की शुचिता केवल विद्यार्थियों का विषय नहीं; यह राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य, आर्थिक विकास और लोकतांत्रिक विश्वास का भी प्रश्न है।

आज समाज में एक तर्क बार-बार सुनाई देता है,”प्रतिस्पर्धा बहुत बढ़ गई है। सब ऐसा कर रहे हैं। केवल ईमानदारी से कुछ नहीं होता।” इतिहास बताता है कि महान सभ्यताओं का पतन ऐसे ही वाक्यों से शुरू होता है। हर बड़े भ्रष्टाचार की शुरुआत किसी छोटे समझौते से हुई थी। हर बड़े नैतिक पतन ने पहले स्वयं को “व्यावहारिकता” का नाम दिया था। जब समाज बेईमानी को “स्मार्टनेस” कहने लगे, तब समझ लेना चाहिए कि समस्या कानून में नहीं, सामूहिक विवेक में है।

कानून आवश्यक है, लेकिन पर्याप्त नहीं, भारत ने सार्वजनिक परीक्षाओं में अनुचित साधनों को रोकने के लिए कठोर कानून बनाए हैं। डिजिटल सुरक्षा बढ़ाई जा रही है। एन्क्रिप्शन, AI आधारित निगरानी और बहुस्तरीय सुरक्षा व्यवस्था लागू की जा रही है। यह सब आवश्यक है। लेकिन कोई भी तकनीक उस पिता को ईमानदार नहीं बना सकती जो स्वयं अपने बच्चे से कहे, “पेपर मिल जाए तो ले लेना।” कोई भी कानून उस समाज को नैतिक नहीं बना सकता जो बेईमानी से सफल व्यक्ति का सम्मान करता रहे। नैतिकता पुलिस स्टेशन में नहीं बनती। वह परिवार में बनती है।

भारत कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, अंतरिक्ष विज्ञान और डिजिटल अर्थव्यवस्था में वैश्विक नेतृत्व का सपना देख रहा है। परंतु किसी भी ज्ञान-आधारित राष्ट्र की सबसे बड़ी पूँजी उसकी विश्वविद्यालय इमारतें नहीं होतीं, उसकी विश्वसनीय प्रतिभा होती है।

यदि विश्व को भारतीय डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक और प्रशासक इसलिए सम्मानित लगते हैं क्योंकि वे वास्तव में योग्य हैं, तभी भारत एक विश्वसनीय ज्ञान-शक्ति बनेगा। लेकिन यदि योग्यता पर संदेह होने लगे, तो सबसे बड़ी क्षति अर्थव्यवस्था को नहीं, भारत के नैतिक ब्रांड (Moral Brand) को होगी। जब आपका बच्चा भविष्य में अपनी सफलता की कहानी अपने बच्चों को सुनाएगा, तब क्या वह गर्व से कह सकेगा, “मैंने यह सब अपनी मेहनत से हासिल किया।” या उसे जीवन भर यह भय रहेगा कि उसकी पहली जीत किसी चोरी के प्रश्नपत्र पर खड़ी थी। एक राष्ट्र का भविष्य उसके परीक्षा परिणामों से नहीं, उसकी परीक्षा संस्कृति से तय होता है।

भारत यदि सचमुच विश्वगुरु बनना चाहता है, तो उसे पहले अपने बच्चों को यह सिखाना होगा कि ईमानदारी कोई आदर्शवादी विलासिता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय विकास का सबसे महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचा है। क्योंकि जिस दिन प्रश्नपत्र बिकना और खरीदना बंद होंगे, उसी दिन केवल परीक्षाएँ ही नहीं बचेंगी,, भारत का चरित्र भी बच जाएगा।

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