राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ - निःस्वार्थ समर्पण की कार्यशाला

प्रमित मिश्रा,
नोएडा

राष्ट्रसेवा का अर्थ केवल बड़े वाक्य नहीं है; वह छोटी-छोटी क्रियाओं में, कठिन समय में, मातृभूमि की रक्षा में, जाति पंथ के बंधनों से दूर रहकर, किसी के कष्टों को अपना समझकर उठे कदमों में और सतत् समर्पण में भी प्रकट होता है। मैंने देखे हैं कुछ ऐसे मतवाले जो बिना किसी लाभ के, बिना किसी वेतन के, बिना कुछ प्राप्ति की इच्छा के लगे रहते हैं राष्ट्र सेवा में…. जुटे रहते हैं उन छोटे छोटे कार्यों में जिनसे हमारे राष्ट्र को पुनः अपनी पुरानी गरिमा वापस मिल सके… वापस मिल सके वह परम वैभव का सिंहासन जो हमारी ही ज्ञात-अज्ञात त्रुटियों से हमारी भारत माता से छिन गया है।

हाँ ! मैं उन्हीं सफेद कमीज, भूरी पतलून व काली टोपी वालों की बात कर रहा हूँ जिनकी निःस्वार्थ सेवा ने देश के अनेक हिस्सों में स्थायी प्रभाव छोड़ा है। फिर चाहे वो सेवा का क्षेत्र हो या राजनीति का, विज्ञान का क्षेत्र हो या कला का…. मैं बात कर रहा हूँ एक स्वयंसेवक की, संघ के एक स्वयंसेवक की जो संघ का आधार है। संघ का एक-एक स्वयंसेवक मोती के रूप में अपनी क्षमता से कहीं अधिक आगे बढ़कर अपने आपको समर्पित करता है और गीत गाता है कि “पतत्वेष कायो नमस्ते नमस्ते”…. ताकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ रूपी यह माला गूथी जा सके और माँ भारती के चरणों में इस माला को समर्पित किया जा सके। स्वयंसेवक का ध्येय बस यही कि – मेरे लिए राष्ट्र प्रथम, मेरे लिए राष्ट्र सर्वोपरि!

स्वयंसेवकों का जीवन बताता है कि सतत् प्रशिक्षण, अनुशासन, जड़ों से जुड़ाव व संस्कृति के गौरव का भान कैसे सामाजिक बदलाव का आधार बनते हैं और यह भी कि आलोचनाएँ या सत्ता की चुनौतियाँ भी सेवा के संकल्प को मंद नहीं कर पातीं, बल्कि कभी‑कभी उन्हें और दृढ़ ही बनाती हैं।

स्मरण करिए कि 2013 के उत्तराखंड के बाढ़ राहत कार्यों में संघ से जुड़े स्वयंसेवकों की भूमिका कैसी रही। स्थानीय राहत-बचाव, पीड़ितों के साथ भावनात्मक लगाव और राहत शिविरों के संचालन में सक्रियता, विकट परिस्थितियों में घर-घर जाकर बंधु बांधवों की निःस्वार्थ सेवा तो ऐसे कर रहे थे मानो इनका कोई सगा विपत्ति में हो। बाढ़ तो कुछ स्वयंसेवकों के अपने घर को भी प्रभावित कर गई थी परंतु इनके लिए अपना घर और अपना राष्ट्र
एक श्रेणी में ही होते हैं और इसीलिए तो वे अपनी बूढी माँ को त्वरित एक सुरक्षित स्थान पर पहुँचाकर, अपनी चिंता किए बिना भारत माँ की सेवा में कूद गए और सैकड़ों परिवारों को काल के दंश से बचाया….।

आते जाते अनायास दिख ही जाता होगा कि कैसे स्वयंसेवक कई जिलों में आयोजित निःशुल्क स्वास्थ्य शिविरों और टीकाकरण ड्राइव के आयोजनों में सक्रिय भूमिका निभाते हुए स्थानीय गांवों में प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता बढ़ाने में निःस्वार्थ भाव से लगे रहते हैं। कुछ क्षेत्रों में स्कूली बच्चों के लिए ट्यूटरिंग, पुस्तकालय स्थापना और शिक्षण सामग्री उपलब्ध कराने जैसै ना जाने कितने कार्यों में स्वयंसेवक लगे ही रहते हैं। कभी गणवेश पहनकर तो कभी सामान्य वेश में, बिना अपनी पहचान बताए ही…. ना जाने कितने ही ऐसे विविध क्षेत्र होंगे जहाँ स्वयंसेवक बिना किसी प्राप्ति की इच्छा के ही लगे होंगे और अपना परिचय भी नही देंते। परंतु हाँ ! उनको पहचानने का तरीका है उनकी वाणी, उनकी राष्ट्र के प्रति अनन्य भक्ति और उनका अनुशासन…।

संघ की शाखाओं पर स्वयंसेवक के रूप में जिस चरित्र, जिस व्यक्तित्व का निर्माण होता है वो अपनी क्षमता, रुचि, प्रकृति व परिस्थिति अनुसार अपना अपना कार्यक्षेत्र चुनते हैं और उसमें अपना उत्कृष्ट देते हैं। परंतु चयन के समय मन में एक ही भावना – “त्वदीयाय कार्याय बद्धा कटीयम्….” फिर चाहे वह स्वयंसेवक भारतीय मजदूर संघ में सेवा देने वाला एक मजदूर यूनियन का कार्यकर्ता हो या भारतीय जनता पार्टी में सेवा देने वाला प्रधान सेवक… संघ की शिक्षा-दिक्षा के माध्यम से वह समाज के प्रत्येक क्षेत्र में एक ही भाव से कार्य करता है – “तन समर्पित मन समर्पित और यह जीवन समर्पित, चाहता हूँ मातृभूमि तुझको अभी कुछ और दूँ।”

सेवा व राष्ट्रभक्ति स्वयंसेवक के लिए कोई प्रकल्प नहीं है, कोई कार्य क्षेत्र का तय कार्यक्रम मात्र नहीं है अपितु यह तो इनके लिए इनकी जीवन पद्धति है। “नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे” की प्रार्थना के माध्यम से सेवा का यह भाव इनके रक्त में संचरित होता है। विपरीत परिस्थितियाँ सदैव जुझारूपन मांगती हैं, और इन परिस्थितियों में सामने खड़े हुए हजारों‑लाखों स्वयंसेवकों ने दिखाया है कि समर्पण का अर्थ अंतिम साँस तक देश और संस्कृति के लिए काम करना है। स्वयंसेवकों के इसी समर्पण की पराकाष्ठा मैंने उत्तर पूर्व के राज्यों में देखी जहाँ दशकों से गुमनाम स्वयंसेवक असहनीय पीड़ा झेलते हुए धरातल पर छोटे छोटे कार्यों में लगे हुए थे और अब दशकों बाद इनके निरंतर संघर्ष के पश्चात इन “Seven Sisters” कहलाने वाले राज्यों में राष्ट्रवाद की एक लहर बह चली है। स्वयंसेवकों का ऐसा ही कुछ समर्पण बंगाल में भी दिखा। बंग की पावन धरा को सैकड़ों स्वयंसेवकों ने कई दशकों से अपने रक्त से सींचा, वहां जमीन की निचली सतह तक शनैः शनैः संघ के वटवृक्ष की जड़ें फैलाईं और अब जाकर यह वृक्ष पवित्र बंगाल रूपी सुंदर पुष्प वाटिका के निर्माण की ओर बढ़ चला है जबकि जिन स्वयंसेवकों ने इस राष्ट्रयज्ञ में अपने प्राणों की आहुति दी, हमें तो उनमें से अधिकांश के नाम भी नही पता… कौन थे वो ? किस जाति के थे ? किस गांव या शहर के थे ? समाज को नहीं पता… संभवतः उनकी भी यही इच्छा रहती है कि उनका नाम मात्र संघ के स्वयंसेवक के रूप में जाना जाए, भारत माता के पुत्र के रूप में जाना जाए…. बस और कोई चाह नहीं…।

आइए हम स्वयंसेवकों के इस समर्पण को नमन करें और संकल्प लें कि आपसी सहभागिता, अनुशासन और निःस्वार्थ भावना से हम भी अपनी मातृभूमि के वैभव को बढ़ाएँगे। एक स्वयंसेवक की भांति हमारी भी यही इच्छा होनी चाहिए, यही एक प्रण होना चाहिए कि — “तेरा वैभव अमर रहे माँ, हम दिन चार रहें ना रहें।”

जय माँ भारती

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