भोजशाला आस्था के साथ सौंदर्य के दर्शन

मध्य प्रदेश के हाईकोर्ट की ओर से “धार“ स्थित “भोजशाला“ को माँ वाग्देवी का मन्दिर घोषित किये जाने के बाद से यह स्थल चर्चा का केन्द्र बन गया है। आस्था, इतिहास और स्थापत्य का यह संगम अब केवल एक धार्मिक स्थल नहीं बल्कि एक पूरा ट्रैवल सर्किट बन चुका है। यदि आप भी “भोजशाला“ देखने की योजना बना रहे हैं, तो इसके साथ “मांडू“ और बाग की गुफाओं का भ्रमण कर एक यादगार यात्रा की जा सकती है।
धार की ऐतिहासिक भोजशाला सदियों से ज्ञान, संस्कृति और श्रद्धा का केन्द्र मानी जाती रही है। माना जाता है कि परमार राजा “भोज“ के काल में यहाँ माँ सरस्वती की आराधना के साथ संस्कृत, दर्शन और शास्त्रों का अध्ययन होता था। विशाल पत्थर के स्तम्भ, कमलाकार नक्काशी, प्राचीन शिलालेख और स्थापत्य की बारीक कलाकृतियां आज भी उस वैभवशाली युग की कहानी कहती हैं। परिसर में प्रवेश करते ही ऐसा लगता है मानो इतिहास स्वयं पत्थरों पर उकेरा हुआ खड़ा हो।
हाईकोर्ट के फ़ैसले के बाद यहाँ श्रद्धालुओं और पर्यटकों की आवाजाही बढ़ी है। मंगलवार को पूजा अर्चना के दौरान परिसर भक्ति और आस्था से सराबोर होता है। भोजशाला अब केवल एक धार्मिक स्थल नहीं बल्कि मालवा की सांस्कृतिक चेतना, प्राचीन विद्या परंपरा और स्थापत्य गौरव का जीवंत प्रतीक बन चुकी है।
भोजशाला – भोजशाला मूलरूप से एक सरस्वती मंदिर के तौर पर स्थापित था, जिसे राजा भोज ने बनवाया था। लेकिन जब अलाउद्दीन खिलजी दिल्ली का सुल्तान बना तो यह क्षेत्र उसके साम्राज्य में मिल गया। उसने इस मन्दिर को मस्जिद में तब्दील करवा दिया। भोजशाला में संस्कृत में अनेक अभिलेख खुदे हुए हैं, जो इस के मन्दिर होने की पुष्टि करते हैं।
धार किला – धार नगर के उत्तर में स्थित यह किला एक छोटी पहाड़ी पर बना हुआ है। लाल बलुआ पत्थर से बना विशाल किला समृद्ध इतिहास के आइने का झरोखा है, जो अनेक उतार चढ़ावों को देख चुका है।
अमझेरा – धार से 27 किमी दूर अमझेरा गांव (तहसील सरदारपुर) स्थित है। इस गाँव में शैव और वैष्णव दोनों के अनेक प्राचीन मंदिर बने हुए हैं। यहाँ के अधिकांश शैव मंदिर भगवान महादेव जी, चामुंडा देवी और देवी अंबिका को समर्पित हैं। भगवान लक्ष्मीनारायण और चतुर्भुजंता मंदिर वैष्णवों के लोकप्रिय मंदिर हैं। गांव के समीप ही ब्रह्म कुंड और सूर्य कुंड नामक दो कुंड हैं। गांव के पास ही राजपूत सरदारों के तीन स्मारक हुए हैं।
बाग गुफाएँ – धार जिले के बाग क़स्बे के पास स्थित बाग़ गुफ़ाएँ देश की प्राचीन चित्रकला और बौद्ध कला की उत्कृष्ट धरोहर मानी जाती हैं। पाँचवीं – छठी शताब्दी की इन गुफाओं को पहाड़ काटकर बनाया गया था। यहाँ के भित्तिचित्रों में बौद्ध जीवन, नृत्य संगीत और सामाजिक जीवन के दृश्य उकेरे गये हैं। इन चित्रों की शैली और रंग संयोजन अजंता गुफाओं की याद दिलाते हैं। गुफाओं के पास बहने वाली बागिनी नदी और आसपास का शांत वातावरण इसे और आकर्षक बनाता है। इतिहास, पुरातत्व और कला में रुचि रखने वाले पर्यटकों के लिये यह स्थान खास अनुभव देता है।
गढ़ कालिका मन्दिर – धार में इंदौर – अहमदाबाद मार्ग पर देवी सागर तालाब के किनारे स्थित पहाड़ी पर “गढ़ कालिका माता मंदिर“ है। यह मंदिर प्राचीन होने के साथ-साथ आस्था का केन्द्र भी है। कई श्रद्धालु देश भर से अपनी मनौतियां पूरी होने के बाद माता के दर्शनों के लिए यहाँ पहुंचते हैं। वर्ष पर्यन्त मनौती माँगने वालों की यहाँ आवाजाही बनी रहती है। क्षत्रिय, परमार, पंवार, पोवार समाज के लोगों की कुलदेवी हैं।
श्री मोहन खेड़ा जैन तीर्थ – श्री मोहन खेड़ा जैन तीर्थ धार से लगभग 47 किमी दूर इंदौर – अहमदाबाद राजमार्ग पर स्थित है, जो जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ को समर्पित है। अपनी आध्यात्मिक शांति, उल्लेखनीय मनमोहक कलात्मक वास्तुकला और विनम्रतापूर्ण आतित्थ्य सत्कार के माध्यम से भक्तों को आकर्षित करता है। इस मंदिर परिसर में तीन शिखरों वाली मीनार और विभिन्न धर्मशालाएँ हैं, जहाँ आगंतुकों को निःशुल्क भोजन उपलब्ध कराया जाता है। यह स्थल जैन संस्कृति और मूल्यों को बढ़ावा देने वाले शैक्षणिक संस्थानों का भी केन्द्र है, जो इसे विश्व भर के श्रद्धालुओं के लिए एक आध्यात्मिक आश्रय स्थल बनाता है।
मांडू – धार से लगभग 35 किमी दूर विंध्याचल की पहाड़ियों पर बसा “मांडू“ इतिहास, प्रेम कथाओं और स्थापत्य का अनूठा संगम है। यहाँ का जहाज़ महल अपनी जल संरचना और वास्तुकला के कारण सबसे अधिक लोकप्रिय केन्द्र है। मानसून के मौसम में जब महल के आस-पास पानी भर जाता है तब यह किसी तैरते जहाज़ जैसा दिखाई देता है। रानी रूपमती मंडप से
नर्मदा घाटी का मनोरम दृश्य दिखाई देता है, जबकि बाजबहादुर महल संगीत और प्रेम-कथा की यादों को संजोए हुए है। इसके अलावा हिंडोला महल, जामा मस्जिद और होशंगाबाद का मकबरा भी पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। मानसून और सर्दियों के मौसम में मांडू का प्राकृतिक सौंदर्य अपने चरम पर रहता है।
आस-पास – अगर आप के पास तीन दिन से अधिक का समय है तो आस-पास के अन्य दिव्य एवं धार्मिक स्थलों का भी भ्रमण कर सकते हैं, जैसे –
महेश्वर – मांडू से महेश्वर लगभग 40 किमी की दूरी पर स्थित है। महेश्वर की समृद्ध सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है। यह होल्कर वंश की राजधानी थी और शहर में कई ऐसे महल और भवन हैं जो उनकी स्थापत्य कला को दर्शाते हैं।
यह शहर अपनी महेश्वरी साड़ियों के लिए प्रसिद्ध है, जिन्हें स्थानीय बुनकर पारंपरिक तकनीकों का उपयोग करके बुनते हैं। ये साड़ियाँ अपनी गुणवत्ता और जटिल डिजाइनों के लिए जानी जाती हैं और इन्हें दुनिया भर में निर्यात किया जाता है।
ओंकारेश्वर – महेश्वर से ओंकारेश्वर की दूरी लगभग 66 किमी है। खंडवा जिले में नर्मदा नदी के बीच मांधाता द्वीप पर स्थित यह मंदिर भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है।
खानपान, संस्कृति और सुविधाएं – धार और मांडू में मालवा का पारंपरिक स्वाद आसानी से मिल जाता है। दाल-बाफले, भुट्टे का कीस और पोहा- जलेबी यहाँ के खास व्यंजन हैं। स्थानीय लोगों की बोली और संस्कृति में मालवी रंग साफ झलकता है।
कहाँ ठहरें – धार और मांडू दोनों जगहों पर रुकने के लिए होटल उपलब्ध हैं। मांडू में एम पी टूरिज़्म के रिसॉर्ट्स भी बेहतर विकल्प हैं।
धार कैसे पहुंचे –
वायुमार्ग द्वारा – धार का निकटतम हवाई अड्डा इंदौर है। यह एयरपोर्ट दिल्ली, मुम्बई, भोपाल और ग्वालियर आदि शहरों से नियमित उड़ानों के माध्यम से जुड़ा हुआ है।
रेल मार्ग द्वारा – रतलाम और इंदौर यहाँ के नज़दीकी रेलवे स्टेशन हैं। देश के प्रमुख शहरों से इन रेलवे स्टेशनों के मध्य अनेक रेलगाड़ियाँ नियमित रूप से चलती हैं।
सड़क मार्ग द्वारा – धार मध्य प्रदेश के अनेक शहरों से सड़क मार्ग द्वारा आसानी से पहुँचा जा सकता है। इंदौर, मांडू, रतलाम, उज्जैन और भोपाल से मध्य प्रदेश परिवहन निगम की नियमित बसें धार के लिए संचालित होती हैं। निजी वाहन या टैक्सी से भी यहाँ आसानी से पहुँच सकते हैं।
कब जायें – घूमने के लिए यहाँ कभी भी जा सकते हैं, लेकिन अक्टूबर से मार्च का मौसम सबसे उपयुक्त माना जाता है। इस समय यहाँ का मौसम सुहावना होता है और मांडू की हरियाली अपने चरम पर रहती है।
घूमने के लिए कितने दिन चाहिये – धार और मांडू घूमने के लिए दो से तीन दिनों का टूर प्लान कर सकते हैं –
1) पहले दिन इंदौर से धार पहुँचकर भोजशाला के दर्शन के साथ अन्य स्थानों पर भ्रमण करें और स्थानीय बाज़ार घूमें।
2) दूसरे दिन मांडू जायें और पूरे दिन वहाँ के प्रमुख स्थलों का भ्रमण करें।
3) तीसरे दिन बाग गुफाओं की यात्रा करें और शाम तक इंदौर वापसी करें।
4) इंदौर आकर शाम को प्रसिद्ध 56 दुकानों और राजबाड़ा बाज़ार में मनपसंद लज़ीज़ व्यंजनों के जायकों का लुत्फ उठायें।




