फ़िल्मों वाला शाहरुख

गाजियाबाद
ज़िंदगी जब ख़्वाबों और ख़्वाहिशों के बादलों से उतरकर ज़मीन पर चलने लगती है, तो वह किसी तपते दोपहर की तरह सीने पर उतरती है। हर कदम के साथ गर्म लू के चाबुक से लगते हैं, और फ़िल्मों में देखे गए हीरो एक ही पल में भाप बनकर उड़ जाते हैं। हाथ में रह जाता है बेलन, सिर पर घर की ज़िम्मेदारियाँ, और दिल में स्वावलंबी बने रहने की ज़िद। इसके बदले मिलता है एक थका हुआ शरीर,और आँखों के नीचे उतरती अनकही उदासी की गहरी परछाइयाँ। झील की ज़िंदगी भी अब इन्हीं सब के बीच साँस ले रही थी।
घर, पति, मेट्रो और मैनेजमेंट इंस्टिट्यूट— इन चारों के बीच वह लूडो की गोटी की तरह दिन भर आगे-पीछे घूमती रहती। कभी उसकी बारी होती, कभी हालात पासा फेंक देते। जिस फ़िल्मी ज़िंदगी का उसने कभी सपना देखा था, अब उसके बारे में सोचने का समय भी उसके पास नहीं बचा था। ख़्वाबों की जगह दिनचर्या ने ले ली थी, और उम्मीदों की जगह एक शांत-सी समझदारी ने। कभी-कभार, जब इंस्टिट्यूट में कोई कार्यक्रम होता, तो झील दो पल को ठहर जाती। थोड़ा सँवरती, आईने के सामने खड़ी होकर ख़ुद से चार बातें करती जैसे पूछ रही हो, “मैं अब भी वही हूँ न?”
और उस छोटे-से ठहराव को ही वह सुकून मान लेती। बाक़ी वक़्त ज़िंदगी घड़ी की सुई के साथ भागती रहती, और झील बिना शिकायत, बिना शोर,उसी रफ़्तार में ख़ुद को समेटे चलती जाती। हर दिन, वही सुबह, वही मेट्रो, वही भीड़। झील की थकी आँखों और आदतन क़दमों के साथ सफ़र करती। हाथ में फ़ाइल, दिमाग़ में दिन भर की सूची, कुछ भी नया नहीं। कभी प्लेटफ़ॉर्म पर किसी लड़की को हँसते देखती तो सोचती – कब आख़िरी बार मैं ऐसे हँसी थी? सवाल बहुत छोटा था, पर जवाब कहीं बहुत गहरे दबा हुआ। मेट्रो चल पड़ती और झील अपनी ज़िंदगी की रफ़्तार में लौट आती।
उस दिन इंस्टिट्यूट में एनुअल फेस्ट था। झील के कंधों पर सबसे अहम ज़िम्मेदारी थी। इंस्टीट्यूट के लॉकर की चाबी भी उसके पास ही थी। उसे ही सुबह जल्दी जाकर सब काम सँभालने थे। घर किचन के सब काम निपटा झील आईने के सामने जा खड़ी हुई। बहुत दिनों बाद झील ने ख़ुद को ग़ौर से देखा न किसी की नज़र से, न किसी की पसंद के पैमाने से, बस अपनी आँखों से।
आईने में खड़ी वह औरत उसे अजनबी नहीं लगी। थोड़ी थकी हुई थी, पर टूटी हुई नहीं। आँखों में अब भी चमक थी, जो बस वक़्त की धूल में ढक गई थी। उसने साड़ी ठीक की, हॉल्टर नेक ब्लाउज़ में अपनी गर्दन की रेखा को देखा, हील्स पहनते हुए ख़ुद की चाल को महसूस किया। सजना-सँवरना हर स्त्री को अच्छा लगता है, पर झील की पसंद थोड़ी अलग थी, सादगी में नयेपन का तड़का, जो उस पर बेहद फबता था। काली बिंदी, बड़े झुमके, खुले बाल…आईने में खड़ी झील अब किसी की प्रतीक्षा में नहीं थी। वह ख़ुद की मौजूदगी से पूरी लग रही थी। उसने हल्के से मुस्कराकर ख़ुद से कहा, “बुरी नहीं हो तुम, झील, बस थक गई हो।” फिर जैसे किसी राज़ की तरह आईने को चार बार चूम लिया। क्योंकि आज उसने किसी और से नहीं, ख़ुद से प्यार किया था।
“झील मोहतरमा…” वह हँस पड़ी, “बस तुम थोड़ा वक़्त आईने को दो—फिर देखो, दुनिया अपने आप पीछे आ जाएगी।”
हँसते हुए जो ही झील की नज़र घड़ी पर गई तो दिल धक धक कर उठा। उई माँ लेट हो गई…और फिर बिना कुछ देखें वो पर्स उठा मेट्रो स्टेशन की तरफ़ भागी अभी रास्ते में ऑटो में ही थी की हेड मैडम का फ़ोन आया, “झील टाइम से पहुँच जाऊंगी ना ? सभी ज़रूरी काग़ज़ तुम्हारी पास है। झील ने कहा, “हाँ मैडम ! कागज सब इंस्टिट्यूट में ही है लॉकर में रख दिए हैं, आप फिक्र न करें।”
फ़ोन रखते ही झील को याद आया की मैचिंग पर्स के चक्कर में चाबी पुराने पर्स में ही रह गई है। गर्मी में शरीर ठंडा पड़ गया। उसने तुरंत ऑटो वाले को वापस चलने को कहा। शुरू में ऑटोवाले ने आनाकानी की पर फिर ज़्यादा पैसे के लालच में मान गया। घर से चाभी ले, झील वापस मेट्रो स्टेशन आ गई हील्स और साड़ी के चक्कर में तेज़ी से भागना पॉसिबल नहीं हो पा रहा था। झील अधिकतर लेडीज़ कोच में सफ़र करना पसंद करती थी। पर जल्दी के समय सामने जो कोच हो वही सही। पर आज जैसे ही प्लेटफ़ार्म पर पहुँची मेट्रो के दरवाज़े बंद हो रहे थे। झील को लगा दूसरी मेट्रो दस मिनट में आएगी। इस वक़्त एक एक मिनट भारी हो रहा था। ये सोच उसने थोड़ा और दौड़ लगायी। तभी एक हाथ बंद होते मेट्रो के दरवाज़े से निकला। जिसने झील को कमर से पकड़कर अंदर खींच लिया। अचानक संतुलन बिगड़ा और झील सीधे उस लड़के के सीने से जा लगी। पल भर को जैसे समय थम गया। मेट्रो की रफ्तार, आसपास की आवाज़ें, सब कहीं पीछे छूट गया। उसे बस अपने कानों के पास किसी और दिल की तेज़ धड़कन सुनाई दे रही थी, अपनी धड़कनों से बिलकुल अलग, फिर भी उससे उलझी हुई।
उसके हाथ अब भी झील की कमर के पास थे, जैसे गिरने से बचाने की ज़िम्मेदारी अभी खत्म नहीं हुई हो। झील ने घबराकर खुद को संभाला, पर दिल मानो मानने को तैयार नहीं था। साँसें हल्की-सी तेज़ थीं, और चेहरे पर अजीब-सी गर्माहट फैल रही थी। वो नज़र उठाकर देख तो नहीं पायी पर महसूस कर रही थी, एक अनजाना चेहरा, पर अजनबी नहीं लग रहा था। झील को लगा, कभी-कभी कुछ लम्हे बिना पूछे, बिना बताए, बस महसूस कर लेने के लिए आते हैं… और चुपचाप दिल में कहीं रुक जाते हैं।
झील नज़र उठा ही नहीं पाई। दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था कि उसे डर था, कहीं सामने वाला भी सुन न ले। उसने बस हल्का-सा सिर झुकाया, जैसे उस पल को अपनी पलकों में छुपा लेना चाहती हो। चेहरे पर फैलती गर्माहट अब शर्म में बदल चुकी थी, और होंठों पर अनजाने में ही एक संकोची-सी साँस ठहर गई।
उसके कदम अपने आप आगे बढ़ गए। बिना कुछ कहे, बिना पलटकर देखे, वह भीड़ को चीरती हुई लेडीज़ कोच की तरफ़ निकल गई। पीछे छूट गया वह पल, वह हाथ, वह धड़कन… पर दिल के किसी कोने में कुछ रह गया था, जो जाने का नाम नहीं ले रहा था।
लेडीज़ कोच में खड़े होकर भी झील खुद को संभाल नहीं पा रही थी। मेट्रो की खिड़की में दिखता अपना अक्स उसे अजनबी-सा लगा—गालों पर हल्की-सी लाली, आँखों में उलझा हुआ सवाल। वह मुस्कुरा दी, बहुत हल्के से। कुछ मुलाक़ातें पूरी नहीं होतीं, फिर भी असर पूरा छोड़ जाती हैं।
तब तक उसका मेट्रो स्टेशन आ चुका था। पूरा दिन फेस्ट में निकल गया। शाम को घर पहुँची तो हील्स ने जैसे बदला ले लिया हो—पाँव पूरी तरह जवाब दे चुके थे। जल्दी-जल्दी कुछ कौर खाए और थकान को साथ लिए बिस्तर पर आ गिरी। आँखें बंद करते ही सुबह की वही घटना सामने आ खड़ी हुई। न चाहकर भी होंठों पर एक धीमी-सी मुस्कराहट तैर गई।
सारी ज़िंदगी फ़िल्मों के सीन देखे थे, हीरो के अचानक आ जाने के सपने बुने थे… और आज, जब सच में ज़िंदगी ने एक DDLJ-सा लम्हा दे दिया, तो वह नज़र उठाकर देख भी न पाई। शर्म, घबराहट और अनकहे एहसास—सब एक साथ दिल में उमड़ आए। कहीं भीतर एक छोटी-सी आस रह गई। क्या फिर कभी मुलाक़ात होगी? पर कैसे पहचानेगी… चेहरा तो देखा ही नहीं। इन्हीं सवालों के बीच, एक हल्की-सी मुस्कराहट ओढ़े वह नींद में डूब गई।
कभी-कभी ज़िंदगी के कुछ हसीन पल यूँ ही छूकर निकल जाते हैं। उस पल में हम अपनी उलझनों से बाहर आकर उन्हें जी नहीं पाते, और फिर उम्र भर इंतज़ार करते रहते हैं कि काश ऐसे ही पल दोबारा आएँ—ताकि इस बार उन्हें सुकून के साथ, पूरी तरह जिया जा सके। अगले कुछ महीनों तक झील रोज़ किसी को ढूँढती रही। किसे ढूँढ रही है, यह वह खुद भी नहीं जानती थी। भीड़ में हर अनजाना चेहरा एक पल को रुकवा देता। उसे लगता था, उसकी ज़िंदगी के दरवाज़े पर शाहरुख़ ने एक बार दस्तक दी थी,और वह उसे पहचान ही नहीं पाई।
शाहरुख़ का इंतज़ार करते-करते दिन महीनों में बदल गए। ज़िंदगी अपनी रफ्तार से चलती रही, पर झील के भीतर कहीं कुछ अटका हुआ था। कभी भीड़ में अचानक किसी का हाथ पास से गुज़र जाता, तो दिल ठिठक जाता। कभी वही जाना-पहचाना परफ्यूम हवा में घुल जाता, और यादें बिना दस्तक दिए लौट आतीं। वह खुद से हँसने की कोशिश करती—इतनी-सी बात पर भी? पर दिल था कि मानता ही नहीं था।
समय बीतता गया… फिर एक दिन नज़र ठहर गई। एक लड़का—पीठ पर बैग, और उस बैग पर DDLJ की वही स्विस काउबेल। झील का दिल जैसे किसी अनकहे सम्मोहन में बँध गया। कदम अपने आप उसके पीछे चल पड़े। दिमाग़ ने रोकना चाहा, पर दिल पहले ही आगे बढ़ चुका था। वह बस एक बार उसका चेहरा देख लेना चाहती थी—सिर्फ़ एक बार।
तभी सामने से एक लड़की आई और उसने उस लड़के को गले लगा लिया। झील इतनी तेज़ चल रही थी, इतनी उम्मीदों में डूबी हुई थी, कि वह दृश्य उसकी आँखों ने देखा ही नहीं। लेकिन जैसे ही वह उनके पास पहुँची, हक़ीक़त पूरे वज़न के साथ सामने खड़ी थी। वह लड़का उस लड़की की बाहों में था। बिलकुल सहज, बिलकुल यक़ीन के साथ। लड़की का सिर उसके कंधे पर टिका था, जैसे उसे वहाँ होने का पूरा हक़ हो। लड़के के चेहरे पर कोई हड़बड़ी नहीं थी, कोई सवाल नहीं—बस अपनापन था, सुकून था। झील ने पहली बार उसे ठीक से देखा, पर अब देखने की चाह भी कहीं फीकी पड़ चुकी थी। क्योंकि वह चेहरा अब उसकी कहानी का नहीं, किसी और की ज़िंदगी का हिस्सा था।
उस पल में झील को जलन नहीं हुई। दुख भी नहीं कम से कम वैसा नहीं, जैसा फ़िल्मों में होता है। बस एक अजीब-सा खालीपन था, जैसे दिल ने चुपचाप मान लिया हो कि कुछ सपने सिर्फ़ देखने के लिए होते हैं, जीने के लिए नहीं। उसे लगा, शायद यही वो सीन था जो उसकी कहानी में कभी लिखा ही नहीं गया था। यहाँ शाहरुख़ किसी और का था। और वह… सिर्फ़ एक दर्शक। एक पल को मन किया, नज़रें चुरा ले। पर फिर उसने खुद को रोक लिया। कभी-कभी सच्चाई को एक बार ठीक से देख लेना ज़रूरी होता है, ताकि दिल आगे बढ़ सके। झील ने हल्के से नज़रें फेर लीं। दिल में कोई शिकवा नहीं था, बस एक शांत-सी स्वीकार्यता थी। फिर वही मुस्कान, थोड़ी टूटी हुई, थोड़ी समझदार।
और वहीं, उसी पल, उसकी कहानी ख़त्म हो गई बिना शोर के। बिना क्लाइमेक्स के। बस एक अधूरी-सी फ़िल्म की तरह, जिसे उसने चुपचाप देख लिया था। दिल में एक खालीपन-सा फैल गया। पल भर के लिए खुद पर ही हैरानी हुई। क्या सच में ज़िंदगी में फ़िल्मों वाले शाहरुख़ होते हैं? या वो सिर्फ़ परदे पर होते हैं, और सपनों में सही बैठते हैं? उसने एक गहरी साँस ली। होंठों पर एक हल्की-सी, थोड़ी थकी हुई मुस्कान आई, जिसमें शिकायत भी थी, और समझदारी भी। फिर वह मुड़ गई। कोई शोर नहीं, कोई आँसू नहीं—बस एक स्वीकार। और चल दी, वही अपनी साधारण-सी, उलझी हुई, कभी हारती-कभी जीतती लूडो वाली ज़िंदगी जीने, जहाँ हर चाल सोच-समझकर चलनी होती है, और हर छक्का हमेशा आपको मंज़िल तक नहीं पहुँचाता, पर खेल फिर भी चलता रहता है। झील थोड़ा मुस्कुराई और मन ही मन बोली बड़े बड़े शहरों में छोटी छोटी बातें तो होती ही रहती है …….. सेनोरिटा।
