प्रेम का अनुबंध

प्रो. उदय प्रताप सिंह, कानपुर

प्रेम के अनुबंध पर मैं गीत लिखना चाहता हूँ।
हृदय के स्पन्दनों पर प्रीत लिखना चाहता हूँ॥

रह गईं हैं हृदय में जो भी
प्रतीक्षित कामनाएं,
तक रही हैं राह अब भी
जो विवश सी याचनाएं,

उन्हीं स्मरणों का मधुरातीत लिखना चाहता हूँ।
प्रेम के अनुबंध पर मैं गीत लिखना चाहता हूँ॥

द्वार से लौट जो आईं
थीं विरह की वेदनाएँ,
पुनः दस्तक दे रही हैं
प्रेम की बन सर्जनाएँ,

जो उन्हें विश्राम दे वो जीत लिखना चाहता हूँ।
प्रेम के अनुबंध पर मैं गीत लिखना चाहता हूँ॥

जाने कितनी ही अधूरी
आस लेकर जी रहा हूँ,

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