पुरानी घड़ी

शालिनी त्रिपाठी,
नवी मुंबई

नाश्ता देते हुए शिखा ने मनुहार के साथ कहा ” ये क्या फिर पुरानी घड़ी बांध ली। मेरी लाई घड़ी अच्छी नहीं लगी क्या ” संजय ने उसे अंकपाश में लेते हुए कहा ” तुम्हारी लाई कोई चीज मुझे अच्छी नहीं लगेगी भला । वो तो इसकी आदत है इसलिए …

दरअसल ये घड़ी उसकी पहली पत्नी रुचि की दी हुई थी। भावुक, सौम्य रुचि उससे बहुत प्यार करती थी और वो भी रुचि की सौम्यता का दीवाना था। ये घड़ी देते हुए रुचि ने बड़ी भावुक होते हुए कहा था “इसे हमेशा अपनी कलाई पर रखना और समझना मैं हूं “

रुचि और उसका साथ दो वर्षों का ही था। उनके पहले बच्चे के जन्म के समय बच्चे की धड़कने रुचि के पेट में ही बंद होने लगी। डाक्टर ऑपरेशन की तैयारी कर रहे तभी रुचि की भी हालत खराब होने लगी और उसके सामने ही रुचि ने अपनी आंखे हमेशा के लिए मूंद ली।

संजय की तो जैसे दुनिया ही उजड़ गई। बावरा सा हो गया था। ऑफिस से आकर गुमसुम अपने कमरे में बंद हो जाता। रुचि की सब चीजें हटा दी गई थी पर एक चूड़ी बेड के ग‌द्दे के नीचे उसे मिल गई थी उसे
देख घंटो रोता रहता। ये सब देख के उसके मम्मी पापा ने उसकी शादी शिखा के साथ तय कर दी और रुचि की मौत के साल भर बाद ही उसकी शादी शिखा के साथ हो गई। वो तो शादी के लिए तैयार भी न था पर मम्मी का रोना धोना और कसम के आगे मजबूर हो गया।

शिखा ने धीरे धीरे उसकी जिंदगी में अपनी जगह बना ली। जहां रुचि के रहते हुए वो सोचता था कि रुचि के सिवा वो किसी से प्यार नहीं कर सकता वहीं अब उसे रुचि की याद कभी कभी ही आती थी। अब शिखा उसका सर्वस्व थी । शिखा को ये पता था कि ये घड़ी रुचि की दी हुई है इसलिए जब भी वो संजय को वो घड़ी बांधे देखती तो उसे पता नहीं क्यों अच्छा नहीं लगता था। इसीलिए वो उसके लिए नई घड़ी लाई और बोली कि ये पुरानी लगती है नई वाली घड़ी अब पहना करो। पर संजय आदतन वहीं घड़ी बांध लेता था।

शिखा ने एक दिन इसी बात पर झगड़ा भी किया और रोई भी। उस दिन संजय का मन ऑफिस में नहीं लगा और शाम को ऑफिस से लौटते हुए उसने वो घड़ी उतार कर बस से बाहर नदी में फेंक दी और सुकून के साथ बस की सीट पर सिर टिका कर बैठ गया।

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