पहचान का प्रश्नन

सीमा त्रिवेदी साज़, नवी मुंबई

पहलगाम हमले की पहली बरसी पर मन और विचारों को छूती रचना के माध्यम से शहीदों को नमन

बाँट डाला देश उसने, रख हृदय में भेद जब।
प्रांत-जाति-भाषाओं पर, हो रहा मतभेद अब॥
राज्य को सरहद बना कर, देश में ही जंग की।
स्वार्थ के शतरंज में फँस, कपट अपनों संग की॥

भूल कर जब एकता हम, देश वासी लड़ मरे।
देख कर यह फूट अपनी, शत्रु तो उत्सव करे॥
याद कर लो शाम वह जब, घाटियाँ सिसकीं भरीं।
बर्फ पहलगाम की जहाँ, रक्त से संचित पड़ीं।

छिन गया सौभाग्य पल में, माँग सूनी हो गई।
स्वप्न सज्जित एक दुल्हन, लाश जैसी हो गई॥
इक पिता का ढाल था जो, गोलियों में बिंध गया।
वृद्ध जीवन का सहारा, एक पल में छिन गया॥

खूब बँटते हैं यहाँ हम, जातियों के नाम पर।
लड़ रहे आज भी हम, तुच्छ कुछ इल्ज़ाम पर॥
किन्तु जब बंदूक की वह, नोक माथे पर लगी।
तब न भाषा, प्रांत, कोई, जाति की ज्वाला जगी?

पूछा बस आतंक ने कि, किस धरम का वंश तू ,
दोष तेरा बस यही है, भारती का अंश तू ।
एक होते क्या वहीं हम, जब निकलते प्राण हैं ?
भूल बैठे क्या रगों में, रक्त हिंदुस्तान हैं ?

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