निदेशक की कलम से

अमित त्रिपाठी

अभिव्यक्ति की आजादी या बेलगाम जुबान

भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को ‘विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ का मौलिक अधिकार देता है। यह अधिकार लोकतंत्र की आत्मा है, जो समाज को प्रगतिशील और पारदर्शी बनाए रखने के लिए अनिवार्य है। लेकिन तेजी से बदलते समय में सार्वजनिक मंचों, सोशल मीडिया और आपसी संवादों में जिस तरह की भाषा का प्रयोग देखा जा रहा है, वह एक बड़ा सवाल खड़ा करता है—क्या हम वाकई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रयोग कर रहे हैं, या यह केवल एक ‘बेलगाम जुबान’ और संस्कारों की अवहेलना का रूप ले चुकी है?

स्वतंत्रता और स्वेच्छाचारिता का अंतर : अभिव्यक्ति की आजादी का अर्थ अपनी बात को तर्कपूर्ण, बिना डरे स्पष्ट तरीके से रखना है। पर, इसका अर्थ यह नहीं कि किसी को भी दूसरों के सम्मान, भावनाओं, या सामाजिक सौहार्द को चोट पहुँचाने का लाइसेंस मिल जाता है। जब अभिव्यक्ति में से ‘संयम’ और ‘सभ्यता’ गायब हो जाती है, तो वह स्वतंत्रता न रहकर स्वेच्छाचारिता और बदजुबानी में बदल जाती है।

सोशल मीडिया और संस्कारों का क्षरण : आज डिजिटल क्रांति के दौर में सोशल मीडिया ने हर हाथ को एक मंच तो दे दिया है पर, साथ ही ध्यान खींचने, व्यूज पाने और खुद को ‘कूल’ या ‘ट्रेंडिंग’ साबित करने की होड़ में भाषाई मर्यादा की बलि भी चढ़ाई जा रही है। विचारों का स्वागत करने की बजाय असहमति जताने के लिए भद्दी गालियों, व्यक्तिगत हमलों और चरित्र हनन का सहारा लिया जा रहा है। इसी के साथ कई ऐसे उदाहरण भी देखने को मिलते हैं जहाँ बड़ों के प्रति अनादर, वरिष्ठों का उपहास और सार्वजनिक जीवन में अमर्यादित शब्दावली का प्रयोग सामान्य बात बनती जा रही है जबकि हमारे संस्कारों में वाणी की मर्यादा का पाठ पढ़ाया जाता है।

संविधान भी सिखाता है मर्यादा : लोग अक्सर संविधान और अधिकारों की दुहाई तो देते हैं, लेकिन उसी संविधान के पाठ को भूल जाते हैं, जो अभिव्यक्ति की आजादी पर “Reasonable Restrictions” भी लगाता है। देश की संप्रभुता, सार्वजनिक व्यवस्था, शिष्टाचार और नैतिकता के हित में अभिव्यक्ति पर सीमाएं तय की गई हैं। यानी, हमारा कानून भी यह स्वीकार करता है कि बिना मर्यादा की आजादी विनाशकारी हो सकती है।

परिणाम और भावी पीढ़ी पर प्रभाव : बदजुबानी को सामान्य घटना मान प्रोत्हासित करने के गंभीर परिणाम हो सकते हैं। संवाद में बदजुबानी और व्यक्तिगत तीखे हमलों से स्वस्थ चर्चा के द्वार बंद हो जाते हैं। ऐसे में भाषाई गिरावट बच्चों और युवा पीढ़ी के मानसिक विकास और नैतिक मूल्यों को प्रभावित कर रही है और अंत में भावी पीढ़ी का पथभ्रष्ट होना स्वाभाविक है। ज्ञात रहे कि अमर्यादित भाषा अक्सर नफरत और हिंसा का रूप ले लेती है, जिससे सामाजिक ताना-बाना छिन्न-भिन्न हो जाता है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अधिकार के साथ अपने साथ एक बड़ा दायित्व भी लाता है। वाणी में ओज और विचारों में कड़वाहट या असहमति हो सकती है, लेकिन भाषा में अश्लीलता और बदजुबानी नहीं होनी चाहिए। हमें यह समझना होगा कि संस्कार और मर्यादा हमारी अभिव्यक्ति को कमजोर नहीं, बल्कि उसे और अधिक प्रभावशाली तथा सम्मानित बनाते हैं। अपनी जुबान पर संयम के साथ संस्कारों का पालन करना गुलामी नहीं, बल्कि एक परिपक्व और सभ्य नागरिक होने की पहचान है और तभी हम अपनी आजादी के पर्व को गर्व के साथ मना सकते हैं।

धन्यवाद
अमित त्रिपाठी

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