चलत बिमान कोलाहल होई

डॉ लक्ष्मी शंकर त्रिपाठी

श्रीराम द्वारा “खैंचि सरासन श्रवण लगि” छोड़े गए इकतीस वाणों ने त्रैलोक्य विजेता लंकापति का संहार कर दिया। जिसके चलने से भूमि डोलने लगती थी, वही लंकेश अब उसी भूमि पर निस्तेज पड़ा है। जिसके अट्टहास से दिशाएं कांपने लगती थी, वही दशानन अब शान्त पड़ा है। जिसकी भृकुटि से देवता कांप उठते थे, उसी लंकाधिपति की आंखें अब बन्द हो चुकी हैं। प्राकृतिक उथलपुथल नियमानुकूल होने लगे, आकाश से देवता पुष्प वर्षा करने लगे, यज्ञशाला की अग्नि प्रज्ज्वलित हो गई, ऋषिगण आश्वस्त हो गए।

विलाप करती हुई मन्दोदरी को धैर्य बंधाते तथा कातर विभीषण को आगामी दायित्व का संज्ञान दिलाते हुए राम अपने शिविर की ओर चल पड़े। लखनलाल को दण्डवत प्रणाम करते देख राम उन्हें उठाकर हृदय से लगाकर विभीषण के राज्याभिषेक का निर्देश देते हैं। रामादल द्वारा ‘जय श्री राम’ के गगनभेदी जयजयकार के बीच राम आगे बढ़े। निष्कंटक देवतागण श्रीराम की पृथक पृथक वन्दना करते हुए अपने स्थान को गए। यहां ध्यातव्य है कि रावण से आतंकित देवगण “जय जय सुरनायक” वन्दना में समूह में थे (सुर समूह बिनती करि) और अब पृथक पृथक, तभी तो गोस्वामी तुलसीदास जी ने इंगित भी किया है– “आए देव सदा स्वारथी”

देवाधिदेव महादेव एवं प्रजापिता ब्रह्मा जी की स्तुति के पश्चात देवराज पधारे। प्रभु श्री राम ने अपने दल के वानर, रीछ के सहयोग, त्याग एवं समर्पण का संज्ञान लेते हुए देवराज इंद्र से युद्ध में वीरगति प्राप्त उनके सैनिकों, “जिन्होंने मेरे कार्य हेतु घर- परिवार ही नहीं जीवन भी त्यागा”, के पुनर्जीवित हो जाने की इच्छा प्रकट की। प्रभु इच्छा को आदेश मान कर देवराज ने अमृत वर्षा की।

“सुधा बृष्टि भई दुहुदल ऊपर, / जिए भालु कपि नहि रजनीचर”।

प्रभु श्रीराम के हाथों निहत सभी राक्षस मुक्ति पा गए थे। यही तो थी ‘वयम रक्षामः’ अभियान के प्रणेता लंकेश की योजना।

                      राज्याभिषेक पश्चात नव लंकेश विभीषण लखनलाल के साथ राज्य कोष तथा पुष्पक विमान लेकर पधारे। माता जानकी पूरे राजकीय सम्मान के साथ पधार कर राम के वाम विराजमान हुईं। क्या ही अद्भुत दृश्य—“शिला पर विराजमान प्रभु श्रीराम, बाएं माता जानकी, दाहिने सर्वदा सतर्क सौमित्र, चरणों में अंजनीलाल, कर जोड़े वन्दना करते लंकेश विभीषण, पम्पानरेश सुग्रीव, ऋक्षराज जामवन्त, युवराज अंगद, नल-नील आदि अन्य कपिश्रेष्ठ”। सभी के सामूहिक जयजयकार के बीच प्रभु ने वानरों की सेवा से प्रसन्न हो कर पुरस्कार स्वरूप कुछ देना चाहा।    

           मणि मालाओं से विभूषित प्रत्येक कपि एवं रीछ भावाभिभूत होकर माता जानकी एवं प्रभु श्रीराम के चरणों में दण्डवत प्रणाम कर धन्य हुए जा रहे हैं। प्रभु एवं माता के स्नेहाशीष से उल्लसित वे अपने भाग्य को सराहने लगे। पगवन्दन की कड़ी में सबसे अन्त में आता है रामादल का एक कपि, जो आकार में तो सभी से छोटा किन्तु सर्वाधिक चंचल। मणि मालाऐं तो अन्य कपि भी धारण किए थे पर अनेकों मालाएं धारण कर नाचते हुए यह कपि सबसे पहले अंजनीलाल फिर लखनलाल के चरणों में प्रणाम करते हुए प्रभु श्रीराम एवं माता जानकी के चरणों में दण्डवत करते हुए भावविभोर हो गया। बड़े स्नेह से उसके सिर पर शुभाशीर्वाद का हाथ फेरते हुए प्रभु एवं माता ने विनोदपूर्वक और भी मालाएं पहना दीं। ऐसा दृश्य सभी को पुलकित कर रहा था।     

             जयजयकार के बीच सहसा श्रीराम अपने स्थान से उठकर सभी का आभार व्यक्त करते हुए कहने लगे—“सर्वाधिक संभावनाओं वाला होता है यह जीवन। व्यक्ति अपने लक्ष्य की प्राप्ति हेतु उद्यम करे तो अभीप्सित उपलब्धि कर सकता है”। आज जिनका वध हुआ है वह व्यक्तित्व असाधारण गुणों से युक्त प्रकांड पंडित, अप्रमेय योद्धा, अद्भुत संगीतज्ञ, अनुपम विज्ञानी एवं अद्वितीय शिव-भक्त था। उत्तम कुल में जन्मा महर्षि पुलस्त्य का सुपौत्र, ऋषि विश्रवा का सुपुत्र आश्रमी शिक्षा के विविध आयामों में दक्ष होकर अपनी कठोर साधना एवं तपश्चर्या से ब्रह्मा एवं शिव से वरदान प्राप्त था। गुणों के साथ दुर्गुण भी प्रभावी होते हैं। ईर्ष्या, क्रोध, बल एवं ज्ञान के अहंकार तथा राज्यलिप्सा की महात्वाकांक्षा ने प्रारम्भिक एवं उत्तरोत्तर सफलता से उत्साहित इस व्यक्तित्व को उद्दंड एवं सद्धर्मच्युत कर दिया था। ऐसे राजा के सैनिक एवं सहयोगी अति उत्साह में और भी क्रूर एवं अत्याचारी होने लगते हैं। देव-कर्म में बाधा, यज्ञ-विध्वंस, नारी तथा निरीह जनों पर भीषण अत्याचार की परिणति तो संहार ही होती है।

                  इस महाअभियान के सहायक ही नहीं मेरे बल थे आप सभी। महाराज सुग्रीव का कुशल सैन्य संचालन, विभीषण की सामयिक युक्ति, जामवन्त जी का अनुभव, युवराज अंगद एवं अन्य कपिश्रेष्ठों का शौर्य, आप सभी का समर्पण तथा अंजनीलाल का पराक्रम ही इस विजय का कारक रहा है। श्रद्धापूर्वक स्मरण करता हूं गृद्धराज बंधुओं–पितातुल्य जटायु जी का जिन्होंने जीवन के अंतिम क्षणों में “दिशा” बताई (लै दच्छिन दिसि गयउ गोसाईं) एवं उनके भाई सम्पाती जी का जिन्होंने भीषण शारीरिक अस्वस्थता भी में “दृश्य” बताया (तहं असोक उपबन जहं रहई, सीता बैठि सोंच बस अहई)। पावन स्मरण करता हूं गुरुदेव सर्वश्री वशिष्ठ, विश्वामित्र, भरद्वाज, बाल्मीकि, अत्रि,सुतीक्ष्ण, अगस्त्य तथा देवी अनुसूया एवं माता शबरी का,जिनका “मार्गदर्शन” इस अभियान में सहायक हुआ।

                अब मैं और विलम्ब ना करते हुए अपनी जन्मभूमि श्री अयोध्या जी की ओर प्रस्थान करना चाहता हूं जहां कातर माताएं, तपस्वी भरत तथा अधीर अवधवासी प्रतीक्षारत हैं।

                  सभी के जयजयकार के बीच प्रभु श्रीराम, माता जानकी, अनुज लखनलाल, आंजनेय पुष्पकारूढ़ होते हैं, साथ में हैं लंकापति विभीषण, पम्पापति सुग्रीव, ऋक्षराज जामवन्त, युवराज अंगद, नल, नील तथा अन्य कपिश्रेष्ठ।

               प्रभु श्रीराम द्वारा की गई प्रशंसा से अभिभूत कपि एवं रीछ गण पुष्पक विमान को आंखों से ओझल होने तक निहारते हुए कहने लगे

        “मसक कहूं खगपति हित करहीं”

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