गन्ने के रस से चलती उम्मीदें और शुगर वाली गाड़ियाँ

डॉ. रामानुज पाठक,

सतना

आजकल देश में विज्ञान, अर्थशास्त्र और राजनीति तीनों का ऐसा अद्भुत संगम हो गया है कि भौतिकी के नियम भी सिर खुजलाने लगे हैं। कोई सज्जन गन्ने के रस की मशीन को सीधे पेट्रोल टैंक से जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। उन्हें पूरा विश्वास है कि गन्ना खेत में उगे या सड़क किनारे मशीन में पिसे, अंततः उसकी नियति इंजन में जलना ही है।

दूसरी ओर डॉक्टर साहब बताते हैं कि आपकी गाड़ी को “डायबिटीज / शुगर” हो गई है। अब गाड़ी भी इंसान की तरह मधुमेह की मरीज हो गई। अगला चरण शायद यह होगा कि कार का फास्टिंग शुगर टेस्ट होगा, इंजन का एच बी ए वन सी निकलेगा और सर्विस सेंटर में लिखा मिलेगा— “आज से मीठा पेट्रोल बंद, केवल शुगर-फ्री ईंधन उपलब्ध है।”

समस्या यह नहीं कि लोग एथेनॉल और गन्ने के रस में भ्रमित हैं। समस्या यह है कि आधी-अधूरी जानकारी आजकल पूर्ण ज्ञान का प्रमाणपत्र बन गई है। किसी ने सुन लिया कि गाड़ी एथेनॉल से चलती है, तो निष्कर्ष निकला कि रस की मशीन को पाइप से जोड़ दो, गाड़ी खेत में ही दौड़ पड़ेगी। जैसे किसी ने सुन लिया कि इंसान का शरीर पानी से चलता है, तो सीधे टंकी में बैठ जाने से अमरत्व मिल जाएगा।

विज्ञान बेचारा चुपचाप कोने में बैठा सोच रहा है कि उसने वर्षों तक किण्वन (फर्मेंटेशन), आसवन (डिस्टिलेशन), निर्जलीकरण (डिहाइड्रेशन) और गुणवत्ता परीक्षण क्यों पढ़ाया? जब दो मिनट के सोशल मीडिया विश्वविद्यालय ने फैसला कर दिया कि रस ही एथेनॉल है।

असलियत यह है कि गन्ने का रस और एथेनॉल उतने ही अलग हैं, जितना गेहूँ और रोटी। गेहूँ सीधे प्लेट में नहीं आता; उसे पिसना, गूँथना और पकना पड़ता है। उसी तरह गन्ने के रस को भी सूक्ष्मजीवों से किण्वित होना पड़ता है, फिर आसवन की प्रयोगशालाओं से गुजरना पड़ता है, तब कहीं जाकर ईंधन-ग्रेड एथेनॉल बनता है। विज्ञान प्रक्रिया का नाम है, शॉर्टकट का नहीं। लेकिन हमारे समय का सबसे बड़ा इंजन पेट्रोल से नहीं, अफवाहों से चलता है। सोशल मीडिया ने हर मोबाइल को विश्वविद्यालय और हर फॉरवर्ड को शोधपत्र घोषित कर दिया है। अब लोग प्रयोगशाला की जगह व्हाट्सऐप पर रसायन विज्ञान पढ़ते हैं और परिणामस्वरूप गाड़ियों को शुगर, मोबाइल को बुखार और लोकतंत्र को वायरल बुखार होने लगता है।

यदि यही गति रही तो कल कोई कहेगा कि दूध से प्लास्टिक बनता है, इसलिए बाल्टी में दूध भरकर कार की बॉडी ढाल लो। कोई बताएगा कि पेड़ों से ऑक्सीजन मिलती है, इसलिए स्कूटर के साइलेंसर में तुलसी का पौधा लगा दो, प्रदूषण शून्य हो जाएगा। तर्क धीरे-धीरे हास्य का पात्र बन जाएगा और हास्य स्वयं यथार्थ जैसा दिखने लगेगा।

इस पूरे प्रसंग का सबसे दुखद पक्ष यह नहीं कि लोग हँस रहे हैं। दुखद यह है कि हम विज्ञान पर नहीं, विज्ञान के नाम पर हँस रहे हैं। कटाक्ष गन्ने के रस पर नहीं, हमारी वैज्ञानिक समझ की मिठास पर है, जिसमें तथ्य कम और कल्पना की चीनी अधिक घुली हुई है।

इसलिए अगली बार यदि कोई गन्ने की मशीन को पेट्रोल टैंक से जोड़ता दिखाई दे तो उसे रोकिए नहीं, बस विनम्रता से पूछिए—”भाई साहब, रस तो इंजन तक पहुँच जाएगा, पर किण्वन संयंत्र, आसवन स्तंभ और रसायन विज्ञान को कहाँ पार्क किया है?”

क्योंकि देश की सबसे बड़ी समस्या ईंधन की नहीं, भ्रम की है; और भ्रम का माइलेज हमेशा तथ्यों से अधिक निकल आता है।

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