एक असाधारण 'सेकंड इनिंग्स': चार्टर्ड अकाउंटेंट से स्पोर्ट्स टाइकून बनने की दास्तां

कोलकाता
कोलकाता स्पोर्ट्स वेंचर्स के प्रमुख श्री पवन कुमार पाटोदिया से हमारे संवाददाता की खेल जगत से जुड़ी मुलाक़ात के मुख्य अंश
प्रश्न 1 : ₹1800 की पहली सैलरी से लेकर एक खेल साम्राज्य खड़ा करने तक—यह जादुई बदलाव कैसे आया?
उत्तर : यह बदलाव कोई रातों-रात हुआ करिश्मा नहीं, बल्कि एक लंबा और सधा हुआ सफर था। 1986 में जब मैंने अपना करियर शुरू किया, तब मेरी जेब में पहली तनख्वाह के रूप में सिर्फ ₹1800 आए थे। लेकिन हौसले बुलंद थे। अगले दो सालों में मैं सीईओ बना, फिर खुद का बिजनेस शुरू किया और दशकों की मेहनत से ईंट-दर-ईंट अपना साम्राज्य खड़ा किया।
इस सफर ने मुझे अनुशासन की ताकत और जोखिम उठाने का सलीका सिखाया। खेल हमेशा से मेरे जहन में थे क्योंकि मेरा मानना है कि मैदान ही वह जगह है जहाँ इंसान का चरित्र और दबाव में अडिग रहने की क्षमता निखरती है। 2020 में, जब मैं रिटायरमेंट की शांति की ओर बढ़ रहा था, तभी कोविड ने दस्तक दी और 59 साल की उम्र में मेरी ‘सेकंड इनिंग्स’ शुरू हुई। मैंने थमने के बजाय कुछ ऐसा बनाने का फैसला किया जो देश के काम आए। यह ट्रांजिशन इत्तेफाक नहीं, बल्कि एक जुनून था।
प्रश्न 2 : भारत में क्रिकेट का जुनून सिर चढ़कर बोलता है, फिर आपने ‘वॉलीबॉल’ के पाले में कदम क्यों रखा?
उत्तर : भारत में हमने बचपन से सिर्फ तीन ही खेलों का शोर सुना है, क्रिकेट, फुटबॉल और हॉकी। पर क्या आप जानते हैं? वॉलीबॉल दुनिया का दूसरा और भारत का तीसरा सबसे ज्यादा खेला जाने वाला खेल है। गली-मोहल्लों से लेकर कॉलेजों तक हम सबने इसे कभी न कभी खेला है, फिर भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हमारी पहचान फीकी थी।
2020 में जब खेलों के प्रति मेरा जुनून चरम पर था, तब क्रिकेट की दुनिया में कदम रखना मेरी वित्तीय सीमाओं से परे था और अन्य खेलों की कीमतें भी सिर्फ शौक के लिए बहुत ज्यादा थीं। तभी किस्मत ने करवट ली। मुझे पता चला कि एक नेशनल वॉलीबॉल लीग शुरू हो रही है। जब मुझे पता चला कि मिस्टर जॉय भट्टाचार्य इसके सूत्रधार (CEO) हैं, तो मेरा आत्मविश्वास बढ़ गया। मुझे लगा कि यही वह मौका है जहाँ मैं अपनी व्यावसायिक सोच से इस उपेक्षित खेल का पूरा ईकोसिस्टम बदल सकता हूँ।
प्रश्न 3 : ‘कोलकाता थंडरबोल्ट्स’, यह सिर्फ एक टीम है या बंगाल की कोई नई उम्मीद?
उत्तर : कोलकाता थंडरबोल्ट्स कोई सीजनल प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि एक लंबी रेस का घोड़ा है। हमारा लक्ष्य सिर्फ मैदान पर जीतना नहीं है, बल्कि बंगाल की मिट्टी की एक ऐसी पहचान बनाना, जिस पर हर बंगाली गर्व कर सकें। एक ऐसा मॉडल तैयार करना जो खुद अपने पैरों पर खड़ा हो सके और निवेशकों के लिए भरोसेमंद बने।
इसे एक ऐसी प्रोफेशनल संस्था बनाना जो सीधे जमीन से जुड़ी प्रतिभाओं को मंच दे। हम यहाँ सिर्फ मैच जीतने नहीं, बल्कि एक विरासत (Legacy) छोड़ने आए हैं।
प्रश्न 4 : क्या आपकी नजरें सिर्फ वॉलीबॉल के नेट पर टिकी हैं या खेल का आसमान और भी बड़ा है?
उत्तर : टीम के तौर पर मेरा पूरा ध्यान वॉलीबॉल पर है, लेकिन एक खेल प्रेमी के तौर पर मेरी उड़ान इससे कहीं बड़ी है। मैं ‘स्पेशल ओलंपिक्स भारत’ से जुड़ा हूँ, जहाँ हम उन बच्चों और युवाओं के लिए काम करते हैं जो बौद्धिक रूप से अक्षम हैं।
अकेले बंगाल में ही हजारों ऐसे ‘स्पेशल एथलीट्स’ हैं जिनमें गजब का हुनर है। वे समाज के हाशिए पर रहने के लिए नहीं बने हैं। मेरा मिशन उन्हें खेल के जरिए मुख्यधारा में लाना और उन्हें बराबरी का हक दिलाना है। तो जवाब है, नहीं, मैं सिर्फ वॉलीबॉल तक सीमित नहीं हूँ; समावेशी खेल विकास मेरी असली जिम्मेदारी है।
प्रश्न 5 : भारत में खेलों का भविष्य—क्या यह सिर्फ मनोरंजन है या कोई उभरती अर्थव्यवस्था?
उत्तर : भारत एक बहुत बड़ी खेल अर्थव्यवस्था की दहलीज पर खड़ा है। अब खेल सिर्फ शौक नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित उद्योग बन रहे हैं। फ्रेंचाइजी मॉडल और मीडिया राइट्स ने इसे परिपक्व बनाया है। लेकिन अभी हमें इंफ्रास्ट्रक्चर और स्पोर्ट्स साइंस पर बहुत काम करना है।
यदि हमें एक विकसित राष्ट्र बनना है, तो खेलों को मनोरंजन नहीं बल्कि आर्थिक बुनियादी ढांचे (Economic Infrastructure) के रूप में देखना होगा। 2036 के ओलंपिक की मेजबानी का सपना भारत में खेलों की एक ऐसी दुनिया तैयार करेगा जिसकी हमने कल्पना भी नहीं की थी।
प्रश्न 6 : क्या आप उन सितारों को भी खोज रहे हैं जो आज कहीं गुमनाम गलियों या जिलों में छिपे हैं?
उत्तर : बिल्कुल! असली चैंपियन 22 की उम्र में नहीं, 12 की उम्र में पहचाने जाते हैं। हमने अब तक जिलों में 13 ग्रासरूट कैंप लगाए हैं। ‘थंडरबोल्ट्स कप’ के जरिए 64 टीमों ने अपना दम दिखाया। हमने महिला वॉलीबॉल को भी बढ़ावा दिया, जिसका नतीजा यह रहा कि हमारी एक एथलीट को रेलवे में नौकरी मिली। हमारा सिद्धांत सरल है, प्रतिभा के दरवाजे पर खुद दस्तक दो, उसके आने का इंतजार मत करो।

प्रश्न 7 : क्या हम भविष्य में कोलकाता में वॉलीबॉल की कोई शानदार अकादमी देखेंगे?
उत्तर : जी हाँ, मेरी योजना कोलकाता में दो अत्याधुनिक अकादमियां शुरू करने की है। ये सिर्फ नाम के लिए नहीं, बल्कि खिलाड़ियों को तराशने वाली संस्थाएं होंगी। इसे लंबे समय तक चलाने के लिए मैं इसे ‘मल्टी-स्पोर्ट्स’ मॉडल पर आधारित रखूँगा और इसके लिए अन्य उद्यमियों से बातचीत जारी है।
चाहे बिजनेस हो या खेल, मेरा दर्शन एक ही है, लगे रहो, नाकामियों को गले लगाओ, तेजी से वापसी करो और कुछ ऐसा रचो जो आपके जाने के बाद भी दुनिया को रौशन करता रहे।
