आधा सच

नई दिल्ली
रहवीं की परीक्षा का परिणाम आए अभी दो ही दिन हुए थे कि दिल्ली से चाचाजी का संदेश आ गया, कुछ दिन के लिए स्मिता को भेज दो। शादी-ब्याह का समय आ जाएगा तो लड़कियां चाहकर भी कहाँ कहीं निकल पाती हैं।माँ ने बात छेड़ी तो मैं समझ गई, दिल्ली जाने का प्रस्ताव जितना सहज सुनाई दे रहा है, उतना है नहीं।
“चली जा बेटी,” माँ ने आँगन में सूखते कपड़े समेटते हुए कहा, “पता नहीं कब तक इस घर का दाना-पानी लिखा है। कल को शादी हो गई तो ससुराल वाले आने दें, न आने दें।”
मैंने झुँझलाकर कहा, “क्यों? क्या मैं इस घर पर बोझ हो गई हूँ?”
माँ ने हाथ का काम रोक दिया। कुछ पल मुझे देखती रही। फिर धीमे से बोली, “बेटियाँ बोझ नहीं होतीं, उनकी चिंता बोझ बन जाती है।”
मैं चुप रही। माँ की आवाज़ भी भर्रा गई- “तेरे बापू का काम-धंधा चौपट हुए पाँच साल हो गए। ऊपर से शराब और जुए ने जो बचा-खुचा था, वह भी खा लिया। दो बेटियों की शादी जैसे-तैसे कर पाए। अभी तुम चार बहनें और बैठी हो। रात को नींद नहीं आती कि किसका घर कब बसाऊँगी।”
मैंने माँ के कंधे पर हाथ रख दिया- “देख लेना माँ, तूने भले बेटे की आस में छह बेटियाँ जनी हों, लेकिन एक दिन यही बेटियाँ लोगों को बेटों से बड़ी लगेंगी।”
माँ फीकी-सी मुस्कराई।
“अच्छा-अच्छा… बड़ी आई दुनिया बदलने वाली। पहले दिल्ली होकर आ। कल मनमोहन वापिस दिल्ली जा रहा है, तू भी उसी के साथ चली जाना।”
अगले दिन मैं दिल्ली आ गई। दिल्ली मेरे लिए किसी और ही दुनिया की तरह थी। चौड़ी सड़कें, भागती हुई बसें, देर रात तक जगती गलियाँ… लेकिन उन सबको देखने का अवसर ही कहाँ मिला। चाची के घर का अपनापन और नई जगह की झिझक, इन्हीं दोनों के बीच दिन बीतने लगे।
दिल्ली आए मुझे अभी तीसरा ही दिन था। शाम के करीब सात बजे बाहर से आवाज़ आई- “ठाकुर साहब! घर पर हो?”
चाची ने दरवाज़ा खोला- “अरे समधिन! आइए, आइए।”
यह भदरा थी। मेरी चचेरी बहन की सास, चाचा-चाची की समधिन। इसी कॉलोनी में ही रहती थी… यानि बुद्ध विहार। किसी सरकारी स्कूल में चपरासी थी, जल्दी पति के गुजर जाने से अनुकम्पा पर नौकरी पायी थी… हँसमुख, बेबाक और बिना लाग-लपेट की औरत, नाम जाने उनका क्या था, लेकिन रिश्तेदारियों में वे भदरा नाम से ही जानी जाती थी।
चाय की पहली चुस्की लेते ही उसने बात छेड़ी- “ठाकुर साहब, जहाँ मैं काम करती हूँ, वहाँ अपने ही ठाकुर समाज का एक लड़का है। सरकारी नौकरी है, अभी मेरे स्कूल में तबादला लेकर आया है, घर-परिवार अच्छा है। अगर कहो तो स्मिता बिटिया के लिए बात चलाऊँ?”
चाचाजी ने उत्सुकता से उसकी ओर देखा। भदरा ने जैसे पूरी जन्मपत्री खोल दी।
लड़का पढ़ा-लिखा है। सरकारी नौकरी करता है। घर का इकलौता बेटा है। दान-दहेज का लालची नहीं। यहाँ तक कि बिना बारात और बिना दहेज शादी करने को तैयार है।
चाचाजी ध्यान से सुनते रहे। जब भदरा बोलते-बोलते रुकी तो उन्होंने शांत स्वर में कहा- “समधिन, बात अच्छी है। लेकिन फैसला मैं अकेला नहीं कर सकता। आखिर लड़की मेरे बड़े भाई की बेटी है। पहले उनसे बात कर लूँ, फिर बताऊँगा।”
भदरा सिर हिलाकर चली गई।
उस रात चाची ने सोते समय मुझे बस इतना बताया कि मेरे लिए एक रिश्ता आया है। मैंने ज़्यादा पूछना उचित नहीं समझा। लेकिन पूरी रात करवटें बदलती रही। कुछ सपने आँखों में तैरने लगे, गाँव की जिन्दगी से निकल शहर में रहने का सपना भी उनमें से एक था। वो रात मानो आँखों में ही कटी।
अगली सुबह चाचाजी ने मुझे बैठक में बुलाया। अंदर वाले कमरे में मेरी चचेरी बहन कविता जचगी के कारण आराम कर रही थी।
मैं संकोच से उनके सामने बैठ गई। चाचाजी कुछ देर तक चुप रहे। फिर बोले- “बेटी, एक रिश्ता आया है।”
मैंने सिर झुका लिया। वे बोले- “लड़का पढ़ा-लिखा है। सरकारी नौकरी करता है। घर-परिवार भी अच्छा है। और सबसे बड़ी बात, दान-दहेज कुछ नहीं चाहता।”
वह यहीं रुक गए। उनकी चुप्पी ने मुझे बेचैन कर दिया। मैंने पहली बार उनकी ओर देखा। उन्होंने गहरी साँस ली। बोले- “बस… एक बात है।”
रा दिल धक से रह गया।
“उसका एक पैर पोलियो से प्रभावित है।”
कमरे में जैसे अचानक सन्नाटा भर गया। मैंने आगे कुछ नहीं सुना। मेरे कानों में बस एक ही शब्द गूँज रहा था- पोलियो… एक पैर… अपाहिज…।
चाजी अब भी बोल रहे थे- “बेटी, तेरे पिता की हालत तुझसे छिपी नहीं है। मैं तुझ पर कोई दबाव नहीं डालूँगा। बस इतना चाहता हूँ कि सोच-समझकर निर्णय लेना।”
मैंने होंठ भींच लिए। आँखों में आँसू भर आए थे। किसी तरह उन्हें रोकते हुए उठी और बिना कुछ बोले भीतर चली गई। कविता दीदी ने मुझे देखते ही मेरा चेहरा पढ़ लिया। उन्होंने मुझसे पूछा- “क्या हुआ?”
मैं उनके गले लगकर फूट पड़ना चाहती थी। लेकिन बस इतना ही कह सकी- “दीदी… क्या सचमुच मुझमें कोई कमी थी… जो मेरे हिस्से यही रिश्ता आया?”
दीदी ने मेरा हाथ पकड़कर अपने पास बैठा लिया- “पगली… आदमी की कीमत उसके शरीर से नहीं होती। और शरीर किसी इन्सान के वजूद की कसौटी नहीं होता… पहले मिल तो ले लड़के से।”
मैं कड़वी हँसी हँस दी- “हम लड़कियों को मिलने का अधिकार होता है, दीदी… फैसला करने का नहीं।””नहीं, स्मिता ऐसी भी बात नहीं है… ।”
स्मिता ने बड़ी मायूसी से कहा- “दीदी, मैं भी तो बाकी लड़कियों जैसी ही हूँ। मैंने भी अपने पति के बारे में सपने देखे थे। कभी नहीं सोचा था कि पहली बार लोग उसके चेहरे से पहले उसका पैर देखेंगे।”
दीदी ने इस बार कोई जवाब नहीं दिया। शायद इसलिए कि मेरे इस सवाल का जवाब उसके पास भी नहीं था। कविता दीदी ने गहरी साँस ली और मेरा हाथ पकड़ लिया।
“दीदी… क्या कभी किसी लड़की के सपनों की भी कोई कुंडली होती है?” मैंने धीमे से पूछा।
कविता दीदी ने चौंककर मेरी ओर देखा।
“सब कह रहे हैं लड़का सरकारी नौकरी करता है। संस्कारी है। अच्छा है। लेकिन कोई यह क्यों नहीं पूछता कि मैंने अपने पति के बारे में क्या सोचा था? मैंने भी तो कभी एक सीधा-सा सपना देखा था- मेरे साथ चलने वाला आदमी भीड़ में अलग न दिखाई दे। क्या यह बहुत बड़ी इच्छा थी?”
कविता दीदी ने मेरा हाथ अपने हाथ में ले लिया। वे बोली- “स्मिता, हर लड़की शादी से पहले ऐसे ही सौ सवाल अपने मन में छिपाए घूमती है। फर्क सिर्फ इतना है कि तेरे सवाल को उसके पैर ने आवाज़ दे दी है।”
मैं चुप रही। वह आगे बोली- “पति-पत्नी का जीवन केवल शरीर से नहीं चलता… और केवल शरीर के बिना भी नहीं चलता। वह विश्वास, अपनापन और साथ से पूरा होता है। बाकी बातें समय सिखा देता है।”
“और अगर मैं उन्हें कभी स्वीकार ही न कर सकी तो?”
कविता दीदी ने गहरी साँस ली- “फिर सबसे ज़्यादा दुख उन्हें नहीं… तुझे होगा। क्योंकि नफ़रत सबसे पहले उसी को जलाती है, जिसके भीतर वह रहती है।”
अंत में उन्होंने मुझे नसीहत दी- “सुन, शादी से पहले तू उसके पैर देख रही है। कोशिश करना, शादी के बाद आदमी को भी देखना। कई बार शरीर पहली नज़र में दिखाई देता है, इंसान बहुत देर से दिखाई देता है।”
मैंने अपनी गरीबी से समझौता कर लिया। और फिर पिताजी की भी तो सहमति थी… पिताजी अपनी गरीबी से मजबूर थे और माँ अपने औरत होने से। माँ भी तो मेरे मन की थाह नहीं ले पायी।
विक्रांत ने मुझसे मिलने की इच्छा जाहिर की, हम भदरा के घर मिले, विक्रांत ने क्या क्या बातें की – वो मेरे लिए ज्यादा मायने नहीं करतीं थीं … लेकिन जब विक्रम उठकर चला तो मैं उसे अपलक देखती रही, उस रात मैं देर तक जागती रही। विक्रांत का चेहरा याद नहीं आ रहा था। उसकी बातें भी धुँधली पड़ गई थीं। बार-बार वही एक दृश्य लौट आता—चलते समय उसका थोड़ा झुक जाना। मुझे अपने ऊपर गुस्सा आ रहा था कि मैं आदमी को भूल रही हूँ और उसका पैर याद रह गया है।
मैं वापिस गाँव भी तो नहीं जा पाई, चाचाजी बीएसएफ में सूबेदार थे, उनकी छुट्टियाँ ख़त्म होने वाली थी…वे चाहते थे कि शादी अभी हो जाए… मन तो हुआ कि कहूँ- “चाचाजी, रिंकल भी तो कॉलेज कर रही है, वह आपकी अपनी बेटी है… आप उसकी शादी क्यों नहीं विक्रम से कर देते, लेकिन पिताजी की गरीबी ने मेरे मुंह को मानो सदा के लिए बंद कर दिया।
क्रम इस शादी को कुछ दिन तक के लिए टालना चाहता था, शायद वह अपनी एम फिल की परीक्षा तक का समय चाहता था, लेकिन चाचाजी ने अपनी छुट्टियों का हवाला दिया और शादी की तारिख तय हो गया।
और अंततः मेरी शादी हो गई। न बैंड बजे, न बारात आई। एक स्कूल की बिल्डिंग में कुछ हमारे अपने लोग थे, कुछ विक्रम के। दो-चार मंत्र पढ़े गए और मैं स्मिता से श्रीमती स्मिता विक्रांत सिंह बन गई। ऐसी शादी होना विक्रांत की इच्छा थी… लेकिन मेरी इच्छा को कहाँ पूछा गया… मेरी भी तमन्ना थी कि मेरी शादी धूमधाम से हो, और धूमधाम से न भी हो कम से कम बड़ी दीदी जितना तो मेरी शादी में भी हो… लेकिन यहाँ तो विक्रांत की महान बनने की इच्छा के सामने सब कुछ ही खत्म हो चुका था।

मेरी तरफ के सब कहते थे, “देखो, कितना अच्छा घर मिला है।” लेकिन मैं जब भी विक्रांत को चलते देखती, उसका लड़खड़ाता कदम मेरे भीतर जैसे हथौड़े की तरह बज उठता। मुझे लगता, मेरी सहेलियाँ अगर मुझे इस हालत में देख लेंगी तो क्या सोचेंगी? गाँव में लोग जरूर यही कहते होंगे- “लड़की में कोई कमी होगी, तभी तो एक अपाहिज के पल्ले बाँध दी गई।”
यह बात किसी ने मुझसे कभी नहीं कही थी। लेकिन मैं खुद से दिन में न जाने कितनी बार कहती थी।
विक्रांत का स्वभाव इतना सहज था कि कभी-कभी वह मुझे खटकने लगता। सुबह उठकर अपनी चाय के साथ मेरी चाय भी बना देता, सब्ज़ी काट देता, रसोई में गैस पर चढ़ी दाल देख लेता। अगर मैं बीमार पड़ जाती तो दवा लाकर सिरहाने रख देता। मैं भीतर ही भीतर चिढ़ जाती।
“इतना अच्छा कोई कैसे हो सकता है? जरूर अपनी कमी छिपाने के लिए यह सब करता है।”
पहली बार जब मैं विक्रांत के साथ बाज़ार गयी तो बाज़ार में चलते हुए मुझे लग रहा था जैसे हर दूसरा आदमी हमें देख रहा है। एक बार मैंने सचमुच पीछे मुड़कर देखा। कोई हमें नहीं देख रहा था। तब समझ में आया कि लोग नहीं, मेरा अपना मन मुझे घूर रहा था। इस दिन के बाद मैं घर में चिड़चिड़ी सी हो गयी।
रे-धीरे मुझे उसके हर व्यवहार में अभिनय नज़र आने लगा।
एक दिन मैंने कहा, “मैं आगे पढ़ना चाहती हूँ।”
उसने बिना एक पल गंवाए पूछा, “अच्छा, बताओ तुम्हें कौन-सा विषय अच्छा लगता है?”
मैंने पहली बार उसकी ओर ध्यान से देखा। मुझे उम्मीद थी कि वह घर-गृहस्थी का हवाला देगा, पैसे की बात करेगा या टाल देगा। लेकिन अगले ही सप्ताह उसने मेरे बी.ए. में दाखिले का फार्म भरवा दिया। वह मुझे खुद कॉलेज ले गया। फीस जमा की। मेरे लिए किताबें खरीदी। और घर लौटते समय बोला, “अब बस पढ़ाई तुम्हारी जिम्मेदारी है।”
मैंने सिर हिला दिया। लेकिन पढ़ाई में मेरा मन कभी लगा ही नहीं। किताब खोलती तो दो पन्नों के बाद ही मन बुझ जाता। क्लास जाने का मन नहीं करता। मैं रात को भी नहीं पढ़ पाती थी, जबकि विक्रांत किताबों में डूबा रहता।
अपनी इस उदासी का कारण भी मैं विक्रांत को ही मानती रही। अगर मेरी शादी किसी सामान्य लड़के से हुई होती… अगर मैं अभी भी मायके में होती… अगर… इन ‘अगरों’ ने मेरी पूरी दुनिया घेर ली। मैं छोटी-छोटी बातों पर उससे उलझने लगी। और वह हर बार चुप रह जाता। उसकी यह चुप्पी भी मुझे और भड़काती- “बोलते क्यों नहीं?”
वह धीरे से कहता, “हर बात का जवाब देना जरूरी नहीं होता।” मुझे लगता, वह मुझे समझ ही नहीं रहा या शायद उसे लगता होगा कि मैं खुद को भी नहीं समझ रही।
एक शाम गुस्से में मैंने कह दिया- “तुम्हें लगता होगा, मैंने बहुत बड़ा एहसान किया है तुमसे शादी करके।”
विक्रांत कुछ क्षण मुझे देखता रहा। फिर बोला- “अगर तुम्हें सचमुच ऐसा लगता है तो इस घर में सबसे बड़ा बोझ मैं नहीं, तुम्हारा यह विश्वास है।”
ऐसा कहते हुए उसकी आँखों में शिकायत नहीं थी। उस रात हम एक ही कमरे में थे, लेकिन दो बिल्कुल अलग दुनियाओं में। ऐसी रातें फिर बढ़ती चली गईं। कई-कई दिनों तक हमारे बीच केवल जरूरत भर की बातें होतीं।
विक्रम हमारी शादी के बाद कभी मेरे गाँव नहीं गया… मेरी छोटी बहनों की शादी में भी नहीं। शायद वह यह बात समझता था कि मैं उसके साथ अपने मायके जाते हुए सहज न हो पाऊं, उसे अपनी सहेलियों या भाभियों से परिचित न करा पाऊं। मैंने भी कभी उसे साथ जान के लिए बाध्य नहीं किया।
एक बार तो मैं रूठकर पूरे पंद्रह दिन मायके चली गई। माँ ने समझाया। पिताजी ने भी कहा, “बेटी, लड़का बुरा नहीं है।”
लेकिन मुझे हर समझाइश अपने खिलाफ साज़िश लगती। मैं लौट तो आई, पर मन वहीं अटका रहा जहाँ से चला था।
समय बीतता रहा लेकिन झगड़े भी बढ़ते गए। एक दिन मेरे मुँह से निकला- “अगर मेरा बाप गरीब न होता तो तुम जैसे इंसान के पल्ले न बंधती…।”
उस दिन विक्रांत को पहली बार गुस्से में देखा था… वह बोला- “अगर तुम्हें लगता है कि मेरा अपाहिज होना इतना बड़ा गुनाह है, और तुम्हारे घर वालों ने मेरे साथ शादी करके तुम्हारे साथ अन्याय किया तो जाओ उनसे न्याय मांगों और मुझसे अलग हो जाओ… जो खर्च मेरे हिस्से आएगा, मैं देने की तैयार हूँ।”
यह बात इतनी दूर तक पहुँची कि दोनों परिवारों को बैठना पड़ा। रिश्ता टूटने की आशंका पहली बार सबकी आँखों में साफ दिखाई देने लगी।
सब विक्रांत से पूछते- “आख़िर हुआ क्या है?” वह हर बार एक ही जवाब देता- “कुछ नहीं… बस स्मिता अभी खुश नहीं है।” कोई वजह पूछता तो वह हल्की-सी मुस्कान के साथ कहता- “शायद वह खुद भी अभी वजह नहीं जानती।”
उसका यह उत्तर मुझे और क्रोधित कर देता। मुझे लगता, वह सबके सामने महान बनने का नाटक कर रहा है। मैं यह समझ ही नहीं पा रही थी कि कभी-कभी सबसे कठिन अभिनय चुप रहना नहीं, बल्कि बिना अभिनय के लगातार सहज बने रहना होता है।
हमारी शादी को दो-ढाई साल हो चुके थे, विक्रांत ने अब रोहिणी में बड़ा फ्लैट ले लिया था, कविता दीदी की ससुराल भी पास में ही थी। एक दिन वे मिलने आई, विक्रांत ड्यूटी गया था, चाय के साथ बातचीत शुरू हुई तो दीदी बोली- “देखकर अच्छा लग रह है, तुम कितना बदल गयी हो, रहन-शान, कपडे, शान-ओ-सौकत… भई! बड़े ठाठ-बाट दिख रहे हैं… ।”
री ऑंखें पनिहायी देख वे बोली- “स्मिता, सब ठीक हैं न, कैसी है तू?”
“ठीक हूँ।”
“झूठ मत बोल।”
मैं बहुत देर तक चुप रही। फिर बोली— “दीदी… मैं कोशिश करती हूँ कि उन्हें सामान्य आदमी की तरह देखूँ। लेकिन जैसे ही वह चलते हैं… मेरी सारी कोशिश टूट जाती है। क्या मैं बहुत बुरी औरत हूँ?”
दीदी शांत बैठी रही। सिर्फ मेरा हाथ पकड़ लिया। उन्हें मौन देख मैंने ही बातचीत फिर से शुरू की “दीदी… आप अन्यथा न लें तो एक बात पूछूँ…?”
“पूछ…”
“क्या हमारा वैवाहिक जीवन… सामान्य रहेगा?”
कविता दीदी ने धीरे से पूछा, “तुझे यह डर किसने दिया?
“किसी ने नहीं… बस मन में आता है।”
“देख, मैं डॉक्टर नहीं हूँ। लेकिन इतना जानती हूँ कि पोलियो का मतलब यह नहीं कि आदमी पति नहीं बन सकता। और अगर कोई बात होगी भी, तो वह तुम दोनों के बीच की बात होगी, दुनिया की नहीं। वैसे भी तुम्हारी शादी को अब काफी दिन हो गए तो तुमको इस का जवाब स्वयं से मिल भी गया होगा।”
समय अपनी चाल से चलता रहा। शादी के पाँच वर्ष कब बीत गए, पता ही नहीं चला। इन पाँच वर्षों में बहुत कुछ बदला था।
मैं बी.ए. भी पूरी नहीं कर पाई। दो बार परीक्षा छोड़ी, तीसरी बार फॉर्म ही नहीं भरा। मेरे भीतर की कड़वाहट ने मेरी किताबें मुझसे छीन ली थीं।
विक्रांत अब विश्वविद्यालय में शोध कर रहा था। नौकरी भी कर रहा था। सुबह जल्दी निकलता, देर शाम लौटता, फिर भी घर आते ही सबसे पहला प्रश्न यही होता- “स्मिता, आज दिन कैसा रहा?”
झे यह प्रश्न भी बनावटी लगता। मैं अक्सर बिना उसकी ओर देखे कह देती- “जैसा रोज़ रहता है।”
धीरे-धीरे हमारे बीच संवाद मरने लगा। हम एक ही घर में रहने वाले दो ऐसे लोग बन गए थे जो एक-दूसरे की दिनचर्या जानते थे, मन नहीं। एक दिन मोहल्ले की किसी औरत ने हँसते हुए मुझसे कहा- “भाभी, मास्टरजी तो बड़े सीधे हैं। भगवान ने पैर में कमी दी है लेकिन दिल में नहीं।” उसका आशय प्रशंसा का था लेकिन मैं भीतर तक जल उठी। मुझे लगा जैसे उसने मुझे याद दिला दिया हो कि मेरे पति ‘सामान्य’ नहीं हैं। उस रात मैंने बिना किसी बात के विक्रांत से झगड़ा शुरू कर दिया- “तुम हर किसी के सामने इतने अच्छे बनने की कोशिश क्यों करते हो?”

विक्रांत ने अख़बार मोड़कर रख दिया- “अच्छा बनने की कोशिश नहीं करता, जैसा हूँ वैसा ही रहता हूँ।”
“झूठ।”
“अगर तुम्हें ऐसा लगता है तो शायद मैं कभी सच साबित नहीं कर पाऊँगा।”
“तुम्हें अपनी कमी का एहसास है, इसलिए सबको खुश रखते हो।”
कमरे में एक लंबी चुप्पी फैल गई। पहली बार मैंने देखा, विक्रांत की आँखों में नमी उतर आई थी। उसने बहुत धीमे स्वर में कहा- “स्मिता… अगर मेरा पैर ठीक होता तो क्या मैं तुम्हें अच्छा आदमी दिखाई देता?”
मैंने कोई उत्तर नहीं दिया। वह फिर बोला- “मैं रोज़ कोशिश करता हूँ कि तुम मुझे मेरे व्यवहार से पहचानो, लेकिन तुम हर बार मेरे पैर तक लौट आती हो।”
मैंने गुस्से में कहा- “क्योंकि वही सच है।”
विक्रांत ने गहरी साँस ली। “नहीं… वह दुर्घटना है… सच मैं हूँ।”
इतना कहकर वह कमरे से बाहर चला गया। उस रात पहली बार वह बैठक में सोया। सुबह उसने हमेशा की तरह चाय बनाई। मेरे लिए भी कप रखा। और बिना कुछ कहे दफ्तर चला गया। पहली बार मुझे एक ऐसी ख़ामोशी दिखाई दी जिसमें किसी की आवाज़ नहीं, किसी का टूटना सुनाई दे रहा था। लेकिन मेरा अहंकार अभी भी मेरी संवेदना से बड़ा था। मैंने अपने मन को फिर समझा लिया- ‘यह भी उसका नया तरीका है मुझे अपराधबोध देने का।’
नहीं जानती थी कि हर बार गलत आदमी को कटघरे में खड़ा करते-करते मैं खुद अपने ही भीतर एक अदालत बना चुकी थी, जहाँ न्यायाधीश भी मैं थी, गवाह भी मैं, और फैसला भी पहले से लिखा हुआ था। उस रात के बाद जैसे हमारे रिश्ते की दिशा बदल गई। पहले विक्रांत मेरे गुस्से को शांत करने की कोशिश करता था। अब उसने कोशिश करना छोड़ दिया। न वह समझाता, न सफाई देता, न मनाता। बस अपने हिस्से के सारे काम पहले की तरह करता रहता। सुबह चाय बनती। मेरे कप में चीनी कितनी डालनी है, उसे याद रहता, पहले अपनी एक चाय छानता फिर एक चम्मच चीनी और डालता…। बाज़ार से लौटते हुए मेरी पसंद की सब्ज़ी भी ले आता। मेरे सिरदर्द की दवा भी बिना कहे रख देता। लेकिन अब वह यह सब करते हुए मुझसे कुछ कहता नहीं था। हमारे बीच संवाद धीरे-धीरे औपचारिक होता गया।
“चाय रख दी है।… दवा अलमारी में है।… मैं निकल रहा हूँ।… आज देर हो जाएगी।” बस इतना ही।
एक दिन मैंने झुँझलाकर कहा- “अगर बोलना ही नहीं है तो यह दिखावा भी मत किया करो।”
विक्रांत ने पहली बार मेरी आँखों में सीधे देखा। उसकी आवाज़ पहले जैसी ही शांत थी- “दिखावा तब होता है, जब आदमी भीतर कुछ और हो, बाहर कुछ और। मैं आज भी वही कर रहा हूँ, जो शादी के पहले दिन करता था। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले उम्मीद थी तुम कभी समझोगी… अब वह उम्मीद छोड़ दी है।”
मैं जैसे पत्थर हो गई। उसने आगे कहा- “स्मिता, मैं तुम्हें बदलना नहीं चाहता। किसी को अपने पक्ष में करने के लिए जीवन बहुत छोटा है।” इतना कहकर वह अपने कमरे में चला गया। उस रात मैं बहुत देर तक जागती रही। पहली बार मुझे लगा, मैंने कोई लड़ाई जीतकर भी सब कुछ हार दिया है।
वर्षों तक साथ रहते-रहते हमारे बीच एक अजीब-सा रिश्ता बन गया था। हम पति-पत्नी कम, एक ही मकान में रहने वाले दो जिम्मेदार व्यक्ति अधिक लगते थे। मैं घर संभालती थी। विक्रांत अपनी नौकरी, शोध और पढ़ाई में डूबा रहता।
एक रात खाना खाते-खाते उसने अचानक पूछा- “स्मिता, तुम खुश हो?” मैंने बिना उसकी ओर देखे कहा, “इस सवाल का कोई मतलब है?” उसने रोटी का टुकड़ा तोड़ते हुए कहा, “है। मेरे लिए है।”
“अगर मैं कह दूँ कि नहीं हूँ, तो क्या बदल जाएगा?” कुछ क्षण वह चुप रहा। फिर बहुत सामान्य स्वर में बोला- “शायद कुछ नहीं… लेकिन मुझे यह जानने का अधिकार तो है कि मेरी वजह से कोई पूरी ज़िंदगी दुखी तो नहीं है।”
मैं झुँझला गई- “फिर वही भावुक बातें!” उसने पहली बार मेरी बात बीच में नहीं काटी। बहुत देर तक थाली में रखी दाल को देखता रहा। फिर बोला- “मैंने बहुत सोचा है इन दिनों।”
मैं चुप रही। उसने कहा- “लगता है, तुम्हारी सबसे बड़ी तकलीफ़ मैं हूँ।”
मैंने पहली बार उसकी ओर देखा। उसके चेहरे पर शिकायत नहीं थी। मानो वह कोई तथ्य बता रहा हो। “अगर ऐसा है…” वह धीमे से बोला- “…तो मुझे तुम्हें रोकने का कोई अधिकार नहीं।”
मेरे हाथ से निवाला छूट गया- “क्या मतलब?”
“मतलब इतना-सा कि जीवन एक ही बार मिलता है। अगर तुम्हें लगता है कि मेरे साथ रहकर तुम्हारा जीवन अधूरा रह गया है, तो मैं तुम्हें उस अधूरेपन की सज़ा नहीं देना चाहता।”
मैं अवाक् उसे देखती रही। वह आगे बोला- “मैं तलाक की बात नहीं कर रहा। न किसी फैसले की। मैं सिर्फ इतना कह रहा हूँ कि तुम अपने जीवन के बारे में बिना मेरे अपराधबोध के सोचो। अगर कभी तुम्हें लगे कि तुम्हारा सुख मुझसे अलग है… तो सिर्फ इसलिए मत रुकना कि समाज क्या कहेगा। मैं तुम्हें बाँधकर नहीं रखना चाहता।”
उसकी आवाज़ में करुणा नहीं थी। दया नहीं थी। त्याग का प्रदर्शन भी नहीं। बस एक गहरी थकान थी। जैसे वर्षों तक किसी बंद दरवाज़े पर दस्तक देने के बाद उसने पहली बार अपना हाथ वापस खींच लिया हो।
उस रात मैं सो नहीं सकी। पहली बार मुझे लगा कि जिसे मैं हमेशा खोया हुआ मानती रही… उसे खो देने का भय कैसा होता है।
न बीतते गए। विक्रांत ने अपना शोध पूरा कर लिया। विश्वविद्यालय से उसे पीएच.डी. की उपाधि मिली। घर में मिठाई आई। सब लोग खुश थे। मैं भी थी… या शायद खुश होने का अभिनय कर रही थी।
उसने प्रमाणपत्र मेरी ओर बढ़ाते हुए बोला- “देखोगी?”
मैंने बिना देखे कहा- “रख दीजिए।”
उसने चुपचाप फ़ाइल मेज़ पर रख दी। उस रात जब सब सो गए, न जाने क्यों मैंने वह फ़ाइल खोल ली। अंदर डिग्री के साथ कुछ पुराने कागज़ भी रखे थे। वे उसके मेडिकल रिकॉर्ड थे। बचपन के। किसी डॉक्टर ने लिखा था- “दाहिने पैर में स्थायी विकलांगता… सामान्य जीवन के लिए नियमित व्यायाम आवश्यक…” मेरे हाथ काँप गए। मैंने पहली बार विक्रांत के जीवन को उसकी आँखों से पढ़ा। अब तक मैं सिर्फ अपने दुःख का हिसाब रखती रही थी। उस आदमी के हिस्से का दुःख कभी पढ़ा ही नहीं, जिसके साथ मैं वर्षों से रह रही थी। फ़ाइल बंद करते समय मेरी नज़र उसके शोध-प्रबंध के पहले पन्ने पर गई। आभार में सबसे ऊपर लिखा था- “अपनी पत्नी स्मिता के नाम, जिसने मुझे धैर्य का वास्तविक अर्थ समझाया।”
मैं बहुत देर तक उस एक पंक्ति को देखती रही। मुझे पहली बार लगा कि यह आदमी झूठा नहीं हो सकता। इतना धैर्य अभिनय नहीं हो सकता। लेकिन उसी क्षण मेरे भीतर एक दूसरा प्रश्न भी उठा- अगर यह अभिनय नहीं था… तो इतने वर्षों से अभिनय कौन कर रहा था? वह… या मैं?
विक्रांत को शोध के साथ साथ ही विश्वविद्यालय में नियुक्ति भी मिल गयी थी, उसका शोध पूरा हुआ तो विश्वविद्यालय में उसे ‘

डॉक्टर विक्रांत सिंह’ कहकर बुलाया जाने लगा।
लेकिन मैंने इस बात पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया। मेरे लिए वह वही आदमी था, जिसके चलते हुए एक पैर ज़मीन पर हल्का-सा घिसटता था।
एक दिन विक्रांत ने सहज भाव से कहा, “अगले हफ्ते कॉलेज का वार्षिकोत्सव है। इस बार मुझे भी सम्मानित किया जाएगा। अगर चलना चाहो तो साथ चलना।”
मैंने औपचारिक-सा ‘हाँ’ कह दिया।
कार्यक्रम वाले दिन पहली बार मैं उसके कॉलेज गई। परिसर में कदम रखते ही कई छात्र-छात्राएँ उसे घेरकर खड़े हो गए- “नमस्ते सर!”
“सर, अगले हफ्ते थोड़ा समय चाहिए।”
“सर, आपने जो किताब बताई थी, मिल गई।”
एक शोधार्थी फाइल लेकर आई। विक्रांत ने उसके कुछ पन्ने देखे और मुस्कराकर कहा, “अब यह शोध तुम्हारा है, मेरा नहीं।”
वह लड़की मेरी ओर मुड़ी और बोली- “मैम, हम लोग सर को केवल शिक्षक नहीं, अपना मार्गदर्शक मानते हैं।”
मैंने औपचारिक मुस्कान दे दी, लेकिन भीतर जैसे कुछ पहली बार हिला। मैंने गौर किया- वहाँ किसी की निगाह उसके पोलियोग्रस्त पैर पर नहीं थी। सब उसके विचारों, उसके व्यवहार और उसके व्यक्तित्व से प्रभावित थे। बरसों में पहली बार मुझे लगा कि शायद मैं ही उसे सबसे कम जानती हूँ।
सभागार खचाखच भरा था। कार्यक्रम के बीच जब ‘श्रेष्ठ शिक्षक सम्मान’ के लिए डॉ. विक्रांत सिंह का नाम पुकारा गया, तो पूरा हॉल तालियों से गूँज उठा। कई छात्र अपनी सीटों से खड़े हो गए। विक्रांत हमेशा की तरह हल्का-सा लँगड़ाते हुए मंच की ओर बढ़ा, लेकिन उस दिन उसकी चाल नहीं, उसके सम्मान की ऊँचाई दिखाई दे रही थी।
सम्मान ग्रहण करने के बाद भी छात्र-छात्राओं का घेरा उसके आसपास बना रहा। कोई शोध पर सलाह चाहता था, कोई भविष्य के बारे में पूछ रहा था, कोई केवल उसके साथ एक तस्वीर लेना चाहता था।
मैं एक ओर खड़ी यह सब देख रही थी कि एक युवती मेरे पास आई और बोली- “मैम, मैं नेहा हूँ… सर के निर्देशन में पीएच.डी. कर रही हूँ।” फिर बिना किसी भूमिका के बोली- “सर जैसे लोग बहुत कम मिलते हैं। पिछले साल मेरी माँ के ऑपरेशन के समय उन्होंने चुपचाप अपनी किताबों की रॉयल्टी मुझे दे दी थी। लौटाने गई तो बोले- ‘यह पैसा किसी और ज़रूरतमंद विद्यार्थी पर खर्च कर देना।'”
वह मुस्कराई- “हम लोग मज़ाक में कहते हैं- सर का एक पैर भले कमज़ोर हो, लेकिन पूरे विभाग को सहारा वही देते हैं।”
उसकी बात सुनकर मैं चुप रह गई। बरसों तक मैं उनके कमज़ोर पैर को देखती रही थी। दुनिया उनके मज़बूत व्यक्तित्व को देख रही थी।
दूर खड़े विक्रांत ने मेरी ओर देखा और मुस्कराकर पूछा- “चलें?” मैंने केवल सहमति में सिर हिला दिया।
वापसी के रास्ते में हम दोनों चुप थे। स्कूटर चलाते हुए विक्रांत ने एक बार भी नहीं पूछा- “कैसा लगा कार्यक्रम?” शायद वह जानता था… कुछ प्रश्नों के उत्तर शब्दों में नहीं दिए जाते। मैं उसके पीछे बैठी थी।
कॉलेज से लौटने के बाद कई दिनों तक मैं भीतर ही भीतर बदलती रही। पहली बार मैंने महसूस किया कि वर्षों से मैं जिस आदमी को उसके एक पैर से पहचानती रही, दुनिया उसे उसके विचारों से पहचानती है।
इसी बीच एक दिन अलमारी ठीक करते समय उसकी पुरानी डायरी हाथ लग गई। पहला ही पन्ना खुला। उस पर केवल एक वाक्य लिखा था- “ईश्वर से कभी यह प्रार्थना नहीं की कि मेरा पैर ठीक कर दो। बस इतनी प्रार्थना की है कि मेरे कारण किसी अपने का जीवन बोझ न बन जाए।”
मैंने डायरी वहीं बंद कर दी। उस रात पहली बार नींद नहीं आई। मुझे लगा, मैं वर्षों से जिस आदमी को कठघरे में खड़ा करती रही, वह स्वयं अपने ही भीतर अपराधबोध ढोता रहा।
उस शाम विक्रांत रोज़ की तरह कॉलेज से लौटा। खाना खाकर किताब पढ़ते-पढ़ते ही सो गया। चश्मा अब भी आँखों पर था। मैंने धीरे से चश्मा उतारा।
तभी वह हल्का-सा कराहा। नींद में ही उसका हाथ अपने पैर पर चला गया। शायद दर्द था। मैं कुछ क्षण उसे देखती रही। फिर जाने किस आवेग में तेल की शीशी उठा लाई।
उसने आँखें खोल दीं- “अरे… यह क्या कर रही हो?”
मेरी आँखें भर आईं, मैं बस इतना कह पाई- “बहुत देर कर दी मैंने…”
“किस बात में?”
“इस पैर को देखकर मैं हमेशा अपने भाग्य को कोसती रही…” मेरी आवाज़ काँप गई- “…आज समझ में आया कि कमी इस पैर में नहीं थी।” मैं आगे कुछ नहीं बोल सकी।
विक्रांत ने धीरे से मेरा हाथ पकड़ लिया- “स्मिता…”
मैंने उसके होंठों पर उँगली रख दी- “आज कुछ मत कहिए…”
कमरे में गहरा सन्नाटा था। बरसों से हमारे बीच जो दूरी थी, वह शब्दों से नहीं, उस स्पर्श से पिघल रही थी।
आज हमारी शादी को पच्चीस वर्ष हो चुके हैं। पीछे मुड़कर देखती हूँ तो समझ में आता है कि विक्रांत को स्वीकार करने में मुझे नहीं, मेरे पूर्वाग्रहों को सबसे अधिक समय लगा। उसके पैर में कमी थी, मेरे देखने के ढंग में। वह जीवन भर अपने एक पैर का भार उठाता रहा, और मैं अपने पूर्वाग्रहों का। सौभाग्य से उसने अपना भार कभी मुझ पर नहीं डाला; धीरे-धीरे मैंने अपना भार उतारना सीख लिया।




