अद्भुत दृष्टा एवं स्पष्ट वक्ता कबीर

सतना
आजकल देश में विज्ञान, अर्थशास्त्र और राजनीति तीनों का ऐसा अद्भुत संगम हो गया है कि भौतिकी के नियम भी सिर खुजलाने लगे हैं। कोई सज्जन गन्ने के रस की मशीन को सीधे पेट्रोल टैंक से जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। उन्हें पूरा विश्वास है कि गन्ना खेत में उगे या सड़क किनारे मशीन में पिसे, अंततः उसकी नियति इंजन में जलना ही है।
दूसरी ओर डॉक्टर साहब बताते आज का समाज विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में निरंतर प्रगति कर रहा है, परंतु इसके साथ ही लोगों के बीच बढ़ती असहिष्णुता, भेदभाव, स्वार्थ और आपसी कटुता भी चिंता का विषय बनती जा रही है। धर्म और जाति के नाम पर होने वाले विवाद समाज की एकता को कमजोर करते हैं। ऐसे समय में संत कबीर दास के विचार अत्यंत प्रासंगिक दिखाई देते हैं। संत कबीर दास ने सदियों पहले ही मानवता, प्रेम, समानता और भाईचारे का संदेश दिया था। उनके विचार आज भी समाज को सही दिशा दिखाने की क्षमता रखते हैं। उन्होंने जाति वर्ग संप्रदाय से हटकर यह माना कि प्रत्येक जीव में ईश्वर का वास है। मूर्ति पूजा को पाखंड बताते हुए कहा कि-
“पाथर पूजे हरि मिले तो मैं पूजूं पहार।
तासो तो चाकी भली पीसि खाए संसार।।”
वहीं जो आहार के लिए पशु हत्या करते हैं उन्हें सचेत करते हुए कहा –
“बकरी पाती खात है, ताकी काढ़ी खाल।
जो नर बकरी खात है, तिनका कौन हवाल॥”
संत कबीर दास भारत के महान संत, कवि और समाज सुधारक थे। उनका पालन-पोषण एक साधारण परिवार में हुआ, इसलिए वे आम लोगों के दुख-दर्द को भली-भाँति समझते थे। उन्होंने अपने दोहों और भजनों के माध्यम से समाज में फैली कुरीतियों, अंधविश्वासों और धार्मिक आडंबरों का विरोध किया। कबीर दास का मानना था कि ईश्वर किसी मंदिर या मस्जिद में नहीं, बल्कि प्रत्येक मनुष्य के हृदय में निवास करते हैं। वे सभी धर्मों का सम्मान करते थे और मानवता को सबसे बड़ा धर्म मानते थे।
कबीर दास की रचनाओं की सबसे बड़ी विशेषता उनकी सरलता और गहनता है। उन्होंने कठिन बातों को भी अत्यंत सहज भाषा में प्रस्तुत किया। उनके दोहे जीवन की सच्चाइयों को सरल शब्दों में समझाते हैं। उनका प्रसिद्ध दोहा—
“पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय॥”
इस दोहे के माध्यम से कबीर दास यह संदेश देते हैं कि केवल पुस्तकीय ज्ञान ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि मनुष्य के भीतर प्रेम, करुणा और मानवता का होना सबसे अधिक आवश्यक है। उनके विचार लोगों को आत्मचिंतन, सत्य और सदाचार की प्रेरणा देते हैं।
उन्होंने इस संसार की नश्वरता को भी बड़े सुंदर शब्दों में बताया –
यहु ऐसा संसार है, जैसा सेमल फूल।
दिन दस के ब्यौहार कौं, झूठे रंग न भूल ॥




