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मेवाड (8th Edition) – janmaitri

शक्ति, भक्ति और बलिदान का क्षेत्र : मेवाड़

New Project (21)

अरविन्द त्रिपाठी पर्यटन प्रेमी,
कानपुर

मेवाड़ साम्राज्य, उदयपुर राज्य के नाम से प्रसिद्ध है। इसमें राजस्थान के उदयपुर, भीलवाड़ा, राजसमंद, चित्तौड़गढ़ और कुम्भलगढ़ किले और मध्य प्रदेश के नीमच तथा मंदसौर ज़िले आते थे।

मेवाड़ में कई पराक्रमी राजा हुए, लेकिन सबसे अधिक प्रसिद्धि महान योद्धा राजा “महाराणा प्रताप सिंह” को प्राप्त हुई। मेवाड़ राजस्थान का गौरव है, जहां एक ओर अपनी वास्तुकला, संस्कृति और समृद्धि तो वहीं दूसरी ओर शूरवीर योद्धाओं और बलिदानी एवं जौहर को अंगीकार करने वाली वीरांगनाओं के लिए प्रसिद्ध है।

मेवाड़ क्षेत्र के स्थलों के भ्रमण करने से पहले यहां के प्रमुख नायक नायिकाओं का संक्षिप्त इतिहास जान लेते हैं, जिनके कारण मेवाड़ सुप्रसिद्ध हुआ।

महाराणा प्रताप सिंह – महाराणा प्रताप सिंह सिसोदिया राजवंश के राजा थे। उनका नाम इतिहास में वीरता, शौर्य, त्याग, पराक्रम और दृढ़प्रण के लिए अमर है। उन्होंने मुग़ल बादशाह अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की और कई वर्षों तक संघर्ष किया।

मीराबाई – मीराबाई का ब्याह मेवाड़ सिसोदिया राजपरिवार के चित्तौड़गढ़ के महाराजा भोजराज के साथ हुआ था। वे एक कृष्ण भक्त और कवयित्री थीं।

पन्नाधाय – पन्नाधाय को उनकी स्वामिभक्ति एवं सर्वोत्कृष्ट बलिदान के लिए जाना जाता है। जिन्होंने अपने एक मात्र पुत्र का बलिदान देकर मातृभूमि के लिए मेवाड़ राज्य के कुलदीपक उदय सिंह की रक्षा करते हुए राष्ट्रधर्म का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया।

इसमें विशेष ध्यान देने की बात यह है कि यह सभी एक ही राजवंश से संबंधित हैं। इसीलिए मेवाड़ साम्राज्य, यहां के गौरव महाराणा प्रताप की शक्ति, मीराबाई की भक्ति और पन्नाधाय के बलिदान का सच्चा प्रतीक है।

मेवाड़ क्षेत्र में कई ऐतिहासिक महत्व के दुर्ग और पर्यटन स्थल हैं। आइये जानते हैं इनके बारे में :

सबसे पहले चलते हैं मेवाड़ साम्राज्य की राजधानी “उदयपुर” :

उदयपुर राजस्थान का एक वैभवपूर्ण शहर और प्रमुख पर्यटन स्थल है, जो कि अपने इतिहास संस्कृति और आकर्षक स्थलों के लिए प्रसिद्ध है। इसे “पूर्व के वेनिस “और “झीलों की नगरी” के नाम से भी जाना जाता है।

उदयपुर के प्रमुख दर्शनीय स्थल —

(1) सिटी पैलेस — यह राजस्थान का सबसे बड़ा महल है। सुंदर प्रसिद्ध और शानदार सिटी पैलेस उदयपुर के जीवन का अभिन्न अंग है, जिसको भ्रमण करने में 3-4 घण्टे लगते हैं। इसमें संग्रहालय है, जिसमें कई वीथिकाएँ हैं। इन वीथिकाओं में विचरण करते पूरे पैलेस का चक्कर लग जाता है। पैलेस में जगह जगह पर खिड़कियाँ और झरोखे बने हुए हैं, जहां से उदयपुर के विहंगम दृश्य को अलग-अलग स्थानों से देखा जा सकता है।

(2) पिछौला झील — झील में दो द्वीप हैं। एक है लेक पैलेस और दूसरा है जग मंदिर पैलेस, दोनों ही महल राजस्थानी शिल्पकला के बेहतरीन उदाहरण हैं, जिन्हें बोट द्वारा जाकर देखा जा सकता है।

(3) लेक पैलेस — दुनिया के सबसे शाही और रोमांटिक होटलों में से एक के रूप में प्रसिद्ध है। लेक पैलेस को जग निवास के नाम से भी जाना जाता है। यह रात में उदयपुर घूमने के लिए सबसे अच्छी जगहों में से एक है।

(4) जग मंदिर पैलेस — जग मंदिर पैलेस एक और खूबसूरत महल है, जो प्रसिद्ध पिछौला द्वीप पर स्थित है।

(5) फतेहसागर लेक — पर्यटकों का यहाँ दिन भर जमावड़ा लगा रहता है। यहां से सूर्यास्त के बहुत सुंदर दृश्य दिखाई देते हैं। यह उदयपुर की दूसरी सबसे बड़ी झील है। इसकी असीम सुंदरता मन को मुग्ध कर देती है।

(6) सज्जन गढ़ पैलेस — इसको मानसून पैलेस भी कहते हैं। बरसात के मौसम में उदयपुर की सुंदरता और अधिक बढ़ जाती है। यहाँ से सूर्योदय और सूर्यास्त दोनों ही बहुत सुंदर दिखाई देते हैं।

(7) शिल्प ग्राम — यहां राजस्थान के पारंपरिक घरों को दिखाया गया है। यहां राज्य के शास्त्रीय संगीत और लोक नृत्य भी प्रदर्शित किये जाते हैं।

(8) मोती मगरी — यहां महापराक्रमी राजा महाराणा प्रताप की 11 फिट ऊँची प्रतिमा है। मोती मगरी, फतेसागर के पास पहाड़ी पर स्थित है। मूर्ति तक जाने वाले रास्ते के आस-पास सुंदर बगीचे हैं।

(9) सहेलियों की बाड़ी — सहेलियों की बाड़ी एक सुंदर गार्डेन है। यह महल की रानी और उनकी सहेलियों के सम्मान में बना एक रमणीक उद्यान है। यहाँ आश्चर्यजनक फौव्वारे, तालाब और संगमरमर के हाथी आदि बने हुए हैं।

(10) जगदीश मंदिर — उदयपुर के मध्य में स्थित एक विशाल मंदिर है। इसमें भगवान विष्णु की मूर्ति अवतार जगन्नाथ को समर्पित है। यह पर्यटकों के आकर्षण का प्रमुख केन्द्र है।

(11) बागोर की हवेली — यह हवेली पिछौला झील के सामने है। इस हवेली में शाम को धरोहर स्टेज शो का आयोजन होता है, जो राजस्थानी संस्कृति और लोक कथाओं का मुख्य आकर्षण है।

(12) भारतीय लोक कला मण्डल — यह मण्डल राज्य की लोककला को संरक्षित करने और मनाने के लिए समर्पित है और इसके लिए लगातार शो आयोजित करता है।

(13) करणी माता मंदिर — करणी माता मंदिर मचला मगरा की पहाड़ियों पर स्थित है। यहां रोप-वे से लुभावने दृश्यों का आनंद लेते हुए केवल पांच मिनट में मंदिर पहुँचा जा सकता है।

(14) दूध तलाई — यह पिछौला झील से लगा एक तालाब है। इसकी वास्तुकला और संगीतमय फौव्वारा आकर्षण का केन्द्र है। यहां के मनोरम दृश्य देखने के लिए “केबल कार” का उपयोग किया जा सकता है और उसमें बैठकर सूर्यास्त का दृश्य देखने का आनन्द तो कुछ और ही है।

(15) UPRE रेस्टोरेन्ट — यह उदयपुर में छत पर बना आलीशान रेस्टोरेन्ट है, जहां शाही अंदाज में सजावट की गई है। रात में इसकी छत से झील और घाटों के सुंदर नजारे दिखते हैं। यहां जाने से पहले फ़ोन पर टेबुल रिज़र्वेशन अवश्य करवा लें।

(16) बाहुबली हिल्स — बाहुबली हिल्स उदयपुर से 14 किमी दूर बड़े तालाब के समीप पहाड़ी पर स्थित है। यह जगह युवाओं में लोकप्रिय और उनका पसंदीदा स्थान बन चुकी है।

इसके अतिरिक्त उदयपुर में सज्जन गढ़ बायोलाजिकल पार्क, विंटेज कार म्यूज़ियम, अम्बराई घाट और गणगौर घाट में भी पर्यटकों का ख़ूब आना-जाना रहता है।

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एकलिंग जी मंदिर

एकलिंग जी मंदिर

एकलिंग जी मंदिर उदयपुर से 18 किमी की दूरी पर स्थित है। यह भगवान शिव जी का चार मुखी मंदिर है और वर्तमान में महाराजा उदयपुर के आधिपत्य वाले ट्रस्ट की देख रेख में है। यहां पर दर्शन के लिए अनुशासन एवं समयबद्धता का बहुत ध्यान रखा जाता है। यहां किसी भी प्रकार के हैण्ड बैग और फोन आदि अंदर नहीं ले जा सकते हैं। मंदिर के बाहर लॉकर की सुविधा उपलब्ध है।

नाथद्वारा मंदिर — नाथद्वारा मंदिर उदयपुर से 49 किमी की दूरी पर स्थित है, यह राजसमंद ज़िले का एक टाउन है। यहां भगवान कृष्ण के बाल रूप के विग्रह युक्त दो प्रतिमाएँ विराजित हैं, जिनमें एक ढाई वर्ष एवं दूसरी सात वर्ष की अवस्था की है। प्रभु का बाल रूप होने के कारण उसी अनुरूप सेवा में थोड़े-थोड़े अंतराल में आरती एवं भोग लगाया जाता है। यहां पर प्रभु की कैसे सेवा की जाती है ? इसके बारे में पुजारी जी विस्तार से जानकारी भी देते हैं।

चित्तौड़गढ़ — चित्तौड़गढ़ भारत का सबसे विशाल दुर्ग है। चित्तौड़गढ़ मेवाड़ की प्राचीन राजधानी थी। यह दुर्ग 180 मीटर ऊँची पहाड़ी पर स्थित है और 700 एकड़ में फैला हुआ है। चित्तौड़गढ़ दुर्ग राजस्थान के इतिहास में त्याग, वीरता, भक्ति, स्वाभिमान और बलिदान का प्रतीक है। अपनी संस्कृति और इतिहास के कारण यह दुर्ग भारत में एक विशिष्ट पहचान बनाए हुए है। अपने लम्बे इतिहास में यह दुर्ग तीन बार आक्रान्त हुआ, और तीनों बार इसकी परिणति जौहर के रूप में हुई, जिसमें दुर्ग की महिलाओं ने बच्चों सहित स्वयं को अग्नि में समर्पित कर दिया जो कि वीरता और बलिदान का प्रतीक है। इन घटनाओं के साथ साथ यहां के भव्य स्मारकीय विरासत चित्तौड़ की महत्ता को प्रदर्शित करते हैं।

चित्तौड़गढ़ के प्रमुख दर्शनीय स्थल — कुम्भा महल, पद्मिनी महल, रतन सिंह महल, विजय स्तम्भ, कीर्ति स्तम्भ, कालिका माता मंदिर, समिद्धेश्वर, पार्श्वनाथ, श्रृंगार गौरी, जटा शंकर मंदिर, मीराबाई मंदिर, जयमल-पन्ना व भामाशाह की हवेली, गोमुख कुंड, कई जलाशय, जौहर स्थल, छतरियाँ और प्रवेश द्वार आदि यहां के महत्वपूर्ण स्मारक हैं।

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सांवलिया सेठ मंदिर

सांवलिया सेठ मंदिर

ऐसी मान्यता है कि भगवान श्री सांवलिया सेठ का सम्बन्ध मीराबाई से है। किंवदंतियों के अनुसार सांवलिया सेठ मीराबाई के वही गिरधर गोपाल हैं, जिनकी वह पूजा किया करती थीं। सांवलिया सेठ मंदिर उदयपुर से चित्तौड़गढ़ की ओर राष्ट्रीय राजमार्ग पर 85 किमी दूरी पर भादसोड़ा ग्राम में स्थित है। यह मंदिर अपनी सुंदरता और वैशिष्ट्य के कारण हर वर्ष लाखों भक्तों को बरबस अपनी ओर आकर्षित करता है। कालांतर में मंदिर की महिमा इतनी फैली कि उनके भक्त वेतन से लेकर व्यापार तक में उन्हें अपना साझीदार बनाते हैं।

विश्वास स्वरूपम (Statue of Belief) — राजसमंद ज़िले के नाथद्वारा स्थित विश्व की सबसे ऊँची शिव मूर्ति “विश्वास स्वरूपम ” की ऊँचाई 369 फिट है। यह प्रतिमा इतनी विशाल है कि इसे देखने में चार घण्टे लगते हैं। प्रतिमा के अंदर अलग-अलग ऊँचाई तक जाने के लिए चार लिफ़्ट लगे हैं। यहां दर्शन करने आने वाले लोगों को 20 फिट से लेकर 351 फिट की ऊँचाई तक का सफ़र करवाया जाता है। इसमें लिफ़्ट के द्वारा 270 फ़ीट की ऊँचाई तक जाकर शिव जी के बाएँ कंधे पर लगे त्रिशूल के दर्शन करके फिर 270 से 280 फ़ीट की ऊँचाई पर जाने के लिए शीशे का ब्रिज बनाया गया है। शीशे से बनी सीढ़ियों से ग्राउंड फ़्लोर का दृश्य अद्भुत अकल्पनीय दृष्टिगोचर होता है। सायंकाल यहां लाइट एण्ड साउण्ड शो भी होता है।

यहां दर्शन के लिए तीन प्रकार के टिकट हैं —

(1) स्टैच्यू के चरणों तक
(2) स्टैच्यू के कंधे तक
(3) स्टैच्यू के शिखर तक, जहां से जलाभिषेक का सुअवसर प्राप्त होता है।

आस पास :

हल्दीघाटी — हल्दीघाटी का इतिहास कौन नहीं जानता है, जहां महाराणा प्रताप और अकबर की सेना का सबसे भयंकर युद्ध लड़ा गया था। यहाँ इतना खून बहा था कि एक तालाब खून से भर गया, जिसे रक्त तलाई कहते हैं। उदयपुर से हल्दीघाटी लगभग 45 किमी दूरी पर है। इस दर्रे का नाम हल्दीघाटी, इस क्षेत्र की पीली मिट्टी के कारण पड़ा है। यहां की मिट्टी का पीला रंग और रक्त का लाल रंग मिल कर युद्ध के बाद कहीं कहीं गुलाबी एवं लाल हो गया है।

चेतक समाधि — राजसमंद के युद्ध स्थल हल्दीघाटी में चेतक समाधि बनी हुई है, जहां महाराणा प्रताप ने भाई शक्ति सिंह के साथ चेतक का दाह-संस्कार किया था।

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हल्दीघाटी संग्रहालय

हल्दीघाटी संग्रहालय

देश भक्ति और स्वाभिमान के प्रतीक महाराणा प्रताप के जीवन की घटनाओं और दृष्टान्तों को विविध रूपों में संजोकर ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक धरोहर संरक्षण का अनूठा प्रयास है। यह संग्रहालय एक अध्यापक डॉ. मोहन लाल श्रीमाली के जीवन संघर्षों के बीच उनकी कल्पना और जुनून का जीवंत उदाहरण है। ऐतिहासिक विरासत का सजीव चित्रण कलाकृतियों, मूर्तिकला के रूप में तो प्रदर्शित किया ही गया है साथ ही लाइट एवं साउण्ड आधारित झांकियां भी बनाई गई हैं।

 

कुम्भलगढ़ — विश्व प्रसिद्ध कुम्भलगढ़ की विशेषता इसका अजेय होना और 36 किमी लंबी और 7 मीटर चौड़ी दीवाल है, जिस पर चार घुड़सवार एक साथ चल सकते हैं। 15 वीं शताब्दी में राणा कुम्भा द्वारा निर्मित इस क़िले की दीवाल को एशिया की दूसरी सबसे बड़ी दीवाल का स्थान प्राप्त है। यह दुर्ग कई घाटियों व पहाड़ियों को मिला कर बनाया गया है, जिससे यह प्राकृतिक सुरक्षात्मक आधार पर अजेय रहा।

कुम्भलगढ़ को मेवाड़ की ऑंख कहते हैं। महाराणा प्रताप की जन्म स्थली कुम्भलगढ़ एक तरह से मेवाड़ की संकटकालीन राजधानी रहा है। महाराणा उदय सिंह को भी पन्नाधाय ने इसी दुर्ग में छिपाकर पालन पोषण किया था। यही वह किला है जो मेवाड़ को मारवाड़ से अलग करता है। इस किले को यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज साइट का स्टेटस भी मिल चुका है। उदयपुर से लगभग 84 किमी दूर कुम्भलगढ़ किला राजस्थान का दूसरा सबसे बड़ा दुर्ग है। इस किले में सात विशाल द्वार हैं। इस किले के अंदर मुख्य भवन बादल महल, कुम्भा महल, झाली रानी का मालिया महल, शिव मंदिर, वेदी मंदिर और नीलकंठ मंदिर हैं। किला परिसर में 60 से अधिक हिंदू और जैन मंदिर बने हुए हैं। यहां सायंकाल में लाइट एण्ड साउण्ड शो होता है। कुम्भलगढ़ किले से दूर दूर तक चारों ओर हरे भरे पहाड़ दिखाई देते हैं। इस किले की निर्माण की एक ख़ासियत यह भी है कि यह ऊँचाई पर होने के बाद भी दूर से दिखाई नहीं देता है, जब तक कि इसके समीप न पहुँच जाएँ।

अगर कहीं घूमने का प्लान बना रहे हैं तो एक बार उदयपुर को केंद्र बनाकर पूरे मेवाड़ का भ्रमण अवश्य कीजिए।

मेवाड़ कब जायें

मेवाड़ घूमने के लिए अक्टूबर से मार्च माह तक का समय सबसे उपयुक्त है। वैसे मानसून के मौसम में उदयपुर और उसके आस-पास की ख़ूबसूरती और अधिक हो जाती है।

कैसे पहुँचें

वायु मार्ग द्वारा — उदयपुर से एयरपोर्ट 20 किमी की दूरी पर स्थित है। जयपुर, जोधपुर, दिल्ली तथा मुंबई से यहां के लिए नियमित उड़ानें उपलब्ध हैं।

रेलमार्ग द्वारा— यहां उदयपुर सिटी नामक रेलवे स्टेशन है। यह स्टेशन देश के अन्य शहरों से जुड़ा हुआ है।

सड़क मार्ग द्वारा— उदयपुर राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 8 पर स्थित है। उदयपुर बस सेवाओं के माध्यम से दिल्ली, इंदौर, जयपुर और कोटा शहरों से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है।

कहाँ ठहरें

उदयपुर और उसके आस-पास लॉज से लेकर अत्याधुनिक होटल एवं रिसॉर्ट्स बहुतायत में उपलब्ध हैं।

“मेवाड़” घूमने के लिए चार-पांच दिन चाहिए। इसकी संभावित
आइटनरी कुछ इस प्रकार हो सकती है :

दिन -1 – उदयपुर लोकल जिसमें सहेलियों की बाड़ी, सिटी पैलेस, करणी माता मंदिर, फतेह सागर झील, जगदीश मंदिर और UPRE में डिनर।

दिन 2 — उदयपुर से चित्तौड़गढ़ > सांवलिया सेठ मंदिर > उदयपुर में लोक कला मण्डल और पिछौला लेक।

दिन 3 — उदयपुर > एकलिंग जी मंदिर > नाथद्वारा > विश्वास स्वरूपम > हल्दीघाटी > श्रीमाली म्यूज़ियम > कुम्भलगढ़ रात्रि विश्राम।

दिन 4 — कुम्भलगढ़ दुर्ग > उदयपुर में सज्जन गढ़ बायोलॉजिकल पार्क, मॉनसून पैलेस, रात्रि विश्राम उदयपुर

दिन 5 — शिल्प ग्राम, मोती मगरी, शॉपिंग, बागोर की हवेली, अम्बराई घाट और गणगौर घाट आदि।

इस प्रकार “मेवाड़” क्षेत्र की यात्रा में 4-5 दिन लग सकते हैं। बाकी स्वेच्छा से यात्रा के दिनों एवं स्थलों को न्यूनाधिक किया जा सकता है।

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