बिषय-बारि मन-मीन

नवी मुंबई
बिषय-बारि मन-मीन भिन्न नहिं होत कबहुँ पल एक ।
तातें सहौं बिपति अति दारुन, जनमत जोनि अनेक ।।
बाबा तुलसी के द्वारा अनेक स्थानों पर अत्यंत सुंदर उदाहरण सांग रूपक के प्रस्तुत किए गए हैं। ये जितने सुरुचिपूर्ण और सुंदर-आकर्षक हैं, उतने ही भावों की गंभीरता से भरे हुए हैं। मानव-मन के स्वरूप की व्याख्या करते हुए गोस्वामी तुलसीदास विनय पत्रिका में लिखते हैं कि सांसारिक विषय-भोग रूपी जल में मन मत्स्य के समान है, जिसका जीवन विषय-भोगों और सांसारिकता में ही है। इसी कारण जीव को अनेक विपत्तियों को सहना पड़ता है, अनेक कष्ट सहने पड़ते हैं और कई-कई योनियों में जन्म लेना पड़ता है। नाना प्रकार के विषयों की आसक्ति में निंरतर लिप्त रहने वाला मन जीव को सांसारिकता के कलुष-कल्मष में लिप्त रखता है और दैव-दुर्लभ मानव-जन्म व्यर्थ ही व्यतीत हो जाता है। सामान्य मानव अपने मन की वृत्तियों को परितृप्त करने, आसक्ति को पूर्ण करने और सांसारिकता के वृहत्तर आयामों को संघटित करने मात्र को ही अपने जीवन का अंतिम लक्ष्य मानकर उसकी पूर्णता के आंकलन से ही अपने जीवन की सार्थकता का मूल्यांकन कर बैठता है। वह सारहीन भौतिक-तत्वों के संकलन में आजीवन संलग्न रहते हुए मानस-तत्व की अनदेखी करता है, उससे विरत रहता है। तुलसीदास के श्रीरामचरितमानस में श्रीराम का चरित्र-वर्णन, चरित-गान, श्रीराम के प्रति भक्ति-भावना का प्रकटीकरण-मात्र महत्त्वपूर्ण नहीं है, बल्कि मानस-तत्त्व भी बहुत महत्त्व का है। इसका स्थान सबसे ऊपर है। बाबा तुलसी की दृष्टि विष्णु के अवतार राम के चरित्र-गान के माध्यम से अपनी भक्ति-भावना को तृप्त करने मात्र तक ही सीमित नहीं है। वे राम के चरित्र की विशिष्टताओं को, और प्रमुख रूप से राम के मन की साधना को लोक-प्रतिष्ठित करके रामराज्य की स्थापना की ओर उन्मुख होते हैं-
दंड जतिन्ह कर भेद जहँ नर्तक नृत्य समाज ।
जीतहु मनहिं सुनिअ अस रामचंद्र के राज ।।
रामराज्य में दंड केवल यतियों, संन्यासियों के हाथ में ही शेष रह गया है और भेद केवल नर्तकों-नृत्यों के मध्य सुर और ताल के अंतर को समझने के लिए ही बचा है। जीतने के लिए केवल मन ही बचा है। रामचंद्र का राज्य ऐसा है – कोई शत्रु ही नहीं है, जिसे जीतना हो। अगर बाबा तुलसी के इस कथन के ध्वन्यार्थ को देखें, तो प्रतीत होता है, कि रामराज्य की विशिष्टताएँ ही मन को जीतकर स्थापित हुई हैं। रामराज्य तभी स्थापित होता है, जब लोग अपने मन को जीत लेते हैं। मन की विजय संसार की विजय-यात्रा से भी अधिक कठिन-कष्टसाध्य है। तुलसी के ‘करम-बचन-मन’ में कर्म और वचन तो बाह्य वृत्तियाँ हैं, मगर मन की आभ्यंतर वृत्ति है। यह मन जो है, वह कर्म और वचन की लगाम अपने हाथ रखता है। यह मनुष्य को वेदना, इच्छा, द्वेष, संकल्प, विचार, बोध और प्रयत्न का अनुभव कराता है। मानव-शरीर की बाह्य क्रियाओं को नियंत्रित और निर्धारित करने के साथ ही मानव की आंतरिक प्रवृत्तियों को संचालित करने के कारण मन को जीत पाना और उसे सकारात्मक दिशा में; अध्यात्म की भाषा में कहें, तो जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्ति दिलाने वाली मोक्ष की दिशा में ले जाना बहुत कठिन है। पुरातन काल से ही मन को जीतने, उसे वश में करने की साधना पर बल दिया जाता रहा है। तुलसी का मानस जिस प्रकार अपने लोक-संस्करण में भक्ति और आस्था के लोकोपयोगी सहज, सरल स्वरूप को स्थापित करता है, उसी प्रकार रामराज्य की स्थापना के लिए मन की शुद्धता पर, मन की साधना पर बल देता है। इसके लिए भी बाबा तुलसी ने सरल, सहज, सुगम स्थापनाएँ दी हैं। इसी कारण श्रीरामचरितमानस अपने नाम-शीर्षक का गूढ़ अर्थ रखता है। राम के चरित्र को अपने मन में उतारने पर, राम के चरित्र के मानस की दशाओं को समझकर अपने मन को उसी अनुरूप चलाने पर मन निर्मल होता है। जब मन निर्मल हो जाता है, तब राम तत्त्व की, राम की भक्ति की और राम की शरणागति प्राप्त होती है।
निर्मल मन जन सो मोहिं पावा ।
मोहिं कपट छल छिद्र न भावा ।।
बाबा तुलसी के राम कहते हैं, कि निर्मल मन वाला व्यक्ति ही मुझे पा सकता है। मुझे कपट, छल, छद्म स्वीकार्य नहीं है, भाता नहीं है। राम मर्यादा के प्रतीक हैं। मर्यादा वह तत्त्व है, जो जीवन जीने की कला को अपने उच्चतम स्तर पर प्रतिष्ठापित करता है। मर्यादित जीवन तभी बन सकता है, जब मन के विकारों से मुक्त होकर निर्मल हो जाया जाए। मन की निर्मलता को कपट, छल-प्रपंच, ईर्ष्या-द्वेष, राग-मोह, लोभ-लालच का परित्याग करके ही पाया जा सकता है। मन की शुद्धि के लिए तुलसीदास द्वारा स्थापित यह अवधारणा अत्यंत सरल है। मानव के रूप में राम की लीला में भी यह देखने को मिलता है। माता कैकेयी के द्वारा राम को वनवास दिए जाने की जिद पर महाराजा दशरथ की विवशता और उस विवशता के सार्थक सकारात्मक हल की परिणति के रूप में राम का वनवास निर्मल मन की स्थिति का ही द्योतक है। यदि राम चाहते, तो वर्तमान के सत्तालोलुप शासकों की भाँति महाराजा दशरथ के विरुद्ध खड़े होकर बड़ी सरलता से ‘तख्तापलट’ कर सकते थे। यदि राम ने ऐसा कर दिया होता, तो संभव था, कि भरत भी विद्रोह पर उतर आते और गृहयुद्ध की ऐसी स्थिति बन जाती, जिसमें अयोध्या का राजपाट विभाजित हो जाता, विखंडित हो जाता। गोस्वामी तुलसीदास ने श्रीरामचरितमानस में भरत और राम के प्रेम को विस्तार से प्रस्तुत किया है। अयोध्या से चित्रकूट तक भरत की यात्रा और राम से भरत के मिलाप के प्रसंग की उन्होंने अत्यंत भावुक और मर्मस्पर्शी प्रस्तुति बड़े विस्तार के साथ इस कारण दी है, क्योंकि उनके समय में राजपाट के लिए बादशाहों के घरों में रचे जाते कुचक्र और मारकाट के किस्से खूब सुने-देखे जा रहे थे। अगर राजा दशरथ द्वारा राम को वनवास दिए जाने पर भी ऐसा हुआ होता, तो कल्पना करें, कि रामराज्य की स्थापना कहाँ रह जाती? राम के निर्मल मन ने भरत को भी ऐसी सीख दी, कि भरत ने राम के वनवास की अवधि में अयोध्या का राजपाट राम के सेवक के रूप में ही चलाया और राम के अयोध्या वापस आने पर उन्होंने उनका राजपाट वापस कर दिया। अगर भरत चाहते, तो राजगद्दी पर अपना अधिकार बनाए ही रखते और एक बार फिर से गृहयुद्ध की स्थिति बन सकती थी, लेकिन यह निर्मल मन का ही प्रभाव था, कि भरत ने अवध का पालन अवधि भर के लिए किया और वनवास मिलने पर राम बटाऊ की तरह, पथिक की तरह पिता के राजपाट को छोड़कर वन को चले गए। रामराज्य का आधार यही बनता है।
जिसकी जैसी भावना होती है, उसको प्रभु की मूरत भी वैसी ही दिखती है। उसको सारा संसार भी वैसा ही दिखता है। इसी कारण तुलसी के राम के मन में माता कैकेयी, दासी मंथरा और रावण आदि आसुरी वृत्ति के लोगों के प्रति घृणा, द्वेष नहीं आता है। वे उन्हें अपने मतिभ्रम के कारण पथ से विचलित मानते हैं और यथोचित परिहार, परिष्कार के माध्यम से उनकी मति के शुद्धिकरण हेतु प्रयत्नरत रहते हैं। मानस में कई स्थानों पर ऐसे प्रसंग आते हैं, जहाँ राम अनेक प्रकार से, विविध माध्यमों से मन के विकारों से ग्रस्त लोगों का उपचार करते दिखते हैं।
तुलसीदास ने विषयों के प्रति मन की आसक्ति को, विषयों के कारण मन में उपजे विकारों को और मन की उच्छृंखलता-चंचलता को मानस-रोग की संज्ञा दी है। वे लिखते हैं-
एहि बिधि सकल जीव जग रोगी ।
सोक हरष भय प्रीति बियोगी ।।
मानस रोग कछुक मैं गाए ।
हहिं सब कें लखि बिरलेन्ह पाए ।।
जाने ते छीजहिं कछु पापी ।
नास न पावहिं जन परितापी ।।
काम, क्रोध, मोह, दुःख, शोक, हर्ष, वियोग आदि अनेक मानसिक रोगों से सारा संसार ग्रस्त है। सामान्य मानव अपने अंदर के इन विकराल रोगों को जान ही नहीं पाते हैं। ये मानस रोग उन्हें जीवन पर्यंत कष्ट देते रहते हैं और सामान्य मानव इन कष्टों में ही स्वयं की सार्थकता को तलाशते रहते हैं। वे लोग, जो इन रोगों को पहचान जाते हैं, वे भी इन पर क्रोध भले ही दिखाते रहें, पर इनसे मुक्त नहीं हो पाते हैं। मानस की इन पंक्तियों में तुलसीदास के स्वयं के जीवन के अनुभवों का सार भी प्रकट होता दिखता है।
बाबा तुलसी अपने जीवन के पूर्वार्ध में इन मानस-रोगों से बुरी तरह ग्रस्त थे। रत्नावली के प्रति उनकी असीमित आसक्ति से जुड़ी कथा सर्वविदित है। जब रत्नावली ने तुलसीदास को फटकारा, कि अस्थि और चर्म की बनी इस नश्वर देह के प्रति तुम्हारी आसक्ति निरर्थक है। तुम्हें तो राम के प्रति आसक्त होना चाहिए। अगर तुम राम से प्रेम करते, तो तुम्हारा जीवन सार्थक हो जाता। रत्नावली की बातों ने बाबा तुलसी को ज्ञान दिया और वे रामभक्ति में लीन हो गए। बाबा तुलसी ने रत्नावली को अपनी ‘धरम की माता’ माना, अपना गुरु माना। बाबा तुलसी के मानस रोगों का यह उपचार उन्हें जीवन-पर्यंत मन की निर्मलता पर एकाग्र रहने हेतु प्रेरित करता रहा। श्रीरामचरितमानस के मानस पक्ष में बाबा तुलसी का यह जीवनानुभव भी जुड़ा हुआ है। वे अपने आराध्य श्रीराम के प्रति अपना विनय-भाव प्रकट करते हैं-
दीनबंधु, सुखसिंधु, कृपाकर, कारुनीक रघुराई ।
सुनहु नाथ! मन जरत त्रिबिध ज्वर, करत फिरत बौराई ।।
विनय पत्रिका का यह पद तुलसीदास के मन में उपजती उस आशंका का द्योतक भी है, जो मन की चंचलता के कारण पथभ्रष्ट हो जाने की तीव्र संभावना से संबद्ध है। बाबा तुलसी हर बार अपने मन को नियंत्रित करने का प्रयास करते दिखते हैं। उनकी भक्ति-भावना में, राम के प्रति उनके विनय भाव में यह निवेदन निश्चित रूप से उपस्थित रहता है, कि उनके आराध्य राम उनके मन के विचलन को नियंत्रित करें। मन ने युगों-युगों तक तन को अपने अनुरूप चलाया है, उसे अपना दास बनाए रखा है। अगर प्रभु कृपा हो जाएगी, तो यह तन अपने मन को अपना दास बना पाएगा, उसे भक्ति में लगा पाएगा।
वस्तुतः, मन में ऐसी शक्ति होती है, जो अपना अलग ही संसार गढ़ लेती है। यह संसार वास्तविकता से, शाश्वत सत्य से परे और पूर्णतः काल्पनिक होता है। पंचदशी में एक प्रसंग आता है-
दूरदेशं गते पुत्रे जीवत्येवात्र तत्पिता ।
विप्रलंभवाक्येन मृतं मत्वा प्ररोदिति ।।
मृतेऽपि तस्मिन्वार्तायाम श्रुतायं न रोदिति ।
अतः सर्वस्य जीवस्य बंधकृन्मानसं जगत् ।।
दूर देश गये हुए पुत्र के जीवित होते हुए भी यदि उसके पिता को कोई दुष्ट व्यक्ति पुत्र के मारे जाने की सूचना देता है, तो पिता वास्तविकता को जाने बिना ही पुत्रशोक में व्याकुल होकर रोने लगता है। उसी प्रकार यदि पुत्र की मृत्यु हो गई है, किंतु उसके पिता को पुत्र की मृत्यु की सूचना नहीं मिलती है तो उसे पुत्रशोक नहीं होता। इस तरह सांसारिक जीवन मन के द्वारा गढ़ लिए गए संसार में जीवित रहता है, चलता रहता है। इसी कारण मनोमय जगत् के अनुरूप ही सुख-दुःख का बोध होता है। मन के द्वारा गढ़ा हुआ संसार जीव को उसकी समझ विकसित होने के साथ ही अपने बंधन में बाँधना प्रारंभ कर देता है। काल की गति के साथ बंधन की तीव्रता भी बढ़ती चली जाती है।

ईश्वर के द्वारा या प्रकृति के द्वारा या ऐसी ही किसी पारलौकिक शक्ति के द्वारा गढ़े गए संसार में अपने-पराए का भेद नहीं होता, राग-द्वेष नहीं होता, मोह-ममता नहीं होती। सारे संसार में, चर-अचर सभी में, सभी के प्रति समता का भाव होता है। मन द्वारा गढ़ा गया संसार अपने-पराये के भेद से, शत्रु-मित्र के बोध से, स्वार्थ से, मोह से, लोभ और लालच से बना होता है। मन की अपार शक्ति के ये केंद्र युगों-युगों से मानव-सृष्टि को स्वयं में इस तरह से बाँधे हुए हैं कि इनसे मुक्त हो पाना सहज में संभव नहीं हो पाता है। अपने समाज से लगाकर अपने परिवार तक के भेद और उसी अनुरूप अपने-अपने स्वार्थों के बंध मन के द्वारा बनाए गए संसार की ही देन हैं। मानव जीवन-भर इन्हीं में भटकता रहता है।
मन के द्वारा गढ़े गए संसार के आवरण से बाहर निकलकर शाश्वत सत्य को जानने और ईश्वर-कृत संसार का उसके वास्तविक रूप में साक्षात्कार करने में ही मन को जीतने की क्रिया निहित है। जब जीव मन को जीत लेता है और मन के बलिष्ठ सैनिकों- लोभ, मोह, अहंकार, मद, ईर्ष्या, राग, द्वेष आदि को पराजित कर देता है, तब जीव को अद्भुत, अपूर्व और अनुपम शांति मिलती है। यह शांति ही मन को ऐसा निर्मल बना देती है, जो प्रभु की, आराध्य की सच्ची भक्ति को, मोक्ष को पाने हेतु अर्ह बना देती है। बाबा तुलसी का ‘निर्मल मन’ ऐसा ही है।
