देखी राम सकल कपि सेना (प्रथम भाग)

वर्षा ऋतु के पश्चात् शरद ऋतु का आगमन हो चुका था। उफनती नदियाँ अपनी सीमाओं तक आ गई थीं। पेड़-पौधे वर्षा ऋतु के जल से स्नान कर और हरे-भरे हो गए थे। रास्तों, पगडंडियों के कीचड़ भी सूख चुके थे। ऐसे मौसम में वनों एवं नदी तट पर वानर दल उछलते कूदते, कभी फूलों से लदे वृक्षों के ऊपर एक डाल से दूसरे डाल तक छलांग लगाते हुए कुछ फल खाते, कुछ फेंकते हुए यदा-कदा नदी के जल में कूद रहे थे। मैं भी अपने साथियों के साथ ऐसी ही क्रीड़ा में मग्न था। सहसा एक विचित्र सांकेतिक ध्वनि ने हम सभी को चौकन्ना कर दिया। यह तो दलनायक की सांकेतिक ध्वनि थी जिसका आशय था कि जो जैसे हो वैसे ही अतिशीघ्र उन तक पहुँचे। क्रीड़ा कर रहे हम सभी वानर उस ध्वनि की ओर वेग से भागने लगे।
वहाँ जाते-जाते अन्य दिशाओं से भी हमारे वानर राज्य के वानरों को उसी ओर भागते देखा। वहाँ दल नायक के समीप ही एक हृष्ट-पुष्ट अति बलिष्ठ अन्य राज्य के कपि को देख कर हमने समझ लिया कि कोई अति आवश्यक महत्वपूर्ण कार्य है। दलनायक ने परिचय देते हुए बताया कि कपि श्रेष्ठ किष्किन्धा के पम्पापुरी के महाराज सुग्रीव द्वारा भेजे गए दूत हैं। अत्यन्त आवश्यक एवं महत्वपूर्ण कार्य हेतु हम सभी को अभी ही प्रस्थान करना है। अन्य वानर राज्यों में भी दूत, भेजे गए हैं। वानरों में सबसे श्रेष्ठ, पराक्रमी और शक्तिवान राज्य के राजा सुग्रीव और युवराज अंगद के बारे में सभी परिचित थे। कुछ दिनों पूर्व ही बालि के वध के पश्चात् सुग्रीव वहाँ के राजा बने थे। उनके आदेश का पालन होना ही था।
पम्पापुरी तक के रास्ते में अन्य राज्यों से जा रहे वानर दलों को देखकर मैं दंग रह गया। विभिन्न कद काठी एवं रंग के बानर दल भी होते हैं मैं अचम्भित सा देख रहा था। इसी बीच रीछों के राजा जामवन्त भी अपनी सेना के साथ उसी ओर जाते दिखे।
महाराज सुग्रीव एक बड़ी शिला पर खड़े थे। पास ही उनके अनन्य सहायक केसरी कपि किशोर हनुमान तथा युवराज अंगद भी थे। ऋक्षराज जामवन्त को आते देख महाराज सुग्रीव शिला से कूद कर उन तक पहुँच कर गले लगा कर अपने साथ शिला तक ले जाते हैं। अन्य वानर दल के महाबली दल नायक जैसे द्विविद, गयंद, नील-नल, गवाक्ष, दधिमुख, केहरि, आदि जैसे-जैसे महाराज सुग्रीव तक अपनी अपनी सेना के साथ पहुँचे, महाराज ने उन नायकों को अपने पास बुला लिया।
सभी उत्सुक थे और कारण जानना चाहते थे कि किसलिए अचानक इतनी बड़ी सेना की आवश्यकता महाराज सुग्रीव को पड़ गई। महाराज सुग्रीव ने सभी को संबोधित करते हुए कहा – साथियों आप सबके एक अत्यन्त महत्वपूर्ण और अति आवश्यक कार्य हेतु यहाँ बुलाया गया है। अयोध्या-नरेश दशरथ के पुत्र राम अपनी भार्या जनक नन्दिनी सीता तथा अनुज लक्ष्मण के साथ पिता को दिए गए वचनानुसार वनवास हेतु विभिन्न स्थानों का भ्रमण करते हुए पंचवटी तक पहुंचे थे। वहाँ किसी राक्षस ने माया से उनकी भार्या का हरण कर लिया। अपनी भार्या की खोज करते हुए वे किष्किन्धा तक आ गए हैं। प्रिय मारुतिनन्दन की पहल से मेरी और उनकी मित्रता हई। मेरी स्थिति को देखते हुए ‘मित्र धर्म’ के अनुसार मेरे प्रति दुर्भाव रखने वाले मेरे ही अग्ग्रज बालि का उन्होंने वध किया। अब मैं अपना मित्रधर्म निभाते हुए उनकी भार्या की खोज का दायित्व आप सब पर छोड़ रहा हूँ। आप सभी सारे वनों पहाड़ों, कन्दराओं, गुफाओं, घने जंगलों से भलीभाँति परिचित हैं। उन स्थानों तक जाकर आपको जनकनन्दिनी सीता का पता लगाना है। इस कार्य हेतु विभिन्न दिशाओं के विशिष्ट जानकारों के दल का गठन किया जा रहा है। आप सभी अपने अपने दल के श्रेष्ठ की सहायता करेंगे। अभी आप सभी को कुमार राम तथा लक्ष्मण के दर्शन कराने हेतु मैं ले चलता हूँ। सबसे पहले पूर्व दिशा की तरफ जाने वाले दल को ले जाया गया फिर पश्चिम और उत्तर को।
मैं दक्षिण दिशा की ओर जाने वाले दल में था जिसका नेतृत्व युवराज अंगद कर रहे थे, अन्य श्रेष्ठ जनों में ऋक्षराज जामवन्त तथा अंजनी सुत हनुमान भी थे। जब मैंने दोनों कुमारों को देखा, देखता ही रह गया। सुन्दर से भी अति सुन्दर मनोहारी स्वरूप के राम जी को देखकर हटने का मन ही नहीं हो रहा था। उन्होंने हमारी इतनी बड़ी सेना के प्रत्येक वानर या रीछ की कुशलता पूछी। ऐसा ही अन्य दिशाओं हेतु तत्पर सेना के प्रत्येक सैनिक का अनुभव था।

युवराज अंगद ने दक्षिण दिशा हेतु प्रस्थान हेतु आज्ञा मांगी। विभिन्न वनों, घने जंगलों, गुफाओं गह्वरों, कन्दराओं नदी के आस-पास के स्थानों को देखते हुए हम जा रहे थे। “प्रारम्भ में उत्साह अधिक होता है, सफलता मिलने पर उत्साह द्विगुणित हो जाता है किन्तु प्रयास के बावजूद परिणाम न आने पर शिथिलता स्वाभाविक है।” थकान अपना प्रभाव दिखाने लगती है उस पर यदि समुचित आहार और जल न मिले तो और भी कठिन स्थिति हो जाती है। ऐसे ही शिथिल हो रहे दल की स्थिति देख पवनपुत्र ने ऊँची एक शिला से देखा एक कन्दरा से पक्षी आ जा रहे थे। बुद्धिमान महावीर समझ गए वहाँ अवश्य कोई जलाशय होगा। हम सभी वहाँ पहुंचकर जल पीकर कुछ आश्वस्त हुए। वहाँ की तपस्विनी स्वयंप्रभा ने संकेत में कुछ कहा जिसे मैं तो न समझ सका किन्तु युवराज अंगद, ऋक्षराज जामवन्त तथा मारुतिनन्दन समझ गए। उन्होंने अपनी योगमाया से हम सभी को सागर तट पर पहुँचा दिया, जब हम सभी फल खाकर और जल पीकर उनींदे से हुए थे। सागर के हहराते, गरजते शब्दों से हम सभी चौंक कर उठे। अब समस्या थी आगे तो सागर है अब कहाँ जाएँ। महाराज सुग्रीव की चेतावनी भी याद आई कि एक मास में अगर पता न लगा सके तो वापस आने पर मृत्युदंड वे स्वयं देंगे। अब तो मृत्यु निश्चित है। दलनायक युवराज अंगद भी कुछ डगमग से दिखे। उन्होंने दुखी होकर कहा कि पिता की मृत्यु के पश्चात् महाराज सुग्रीव ने उन्हें युवराज श्री राम के आदेश से ही बनाया है। ऋक्षराज जामवन्त ने बहुत तरह से अंगद को समझाया कि ज्यादा विह्वल न हो। जिनके कार्य के लिए हम लोग निकले हैं वे अवश्य ही हमारे लिए कोई न कोई रास्ता निकालेंगे। युवराज के भावुक होने से हमारे जैसे कपि भी भावुक होकर कहने लगे हम भी युवराज अंगद के साथ ही यहाँ अपने प्राण त्याग देंगे।
इस बातचीत, कोलाहल को अचानक शान्त किया एक विचित्र ध्वनि ने – “आज बहुत दिनों बाद इतना आहार एक साथ मिल रहा है। हम सभी चौंके – क्या कोई विकट राक्षस आ गया है तभी शिला की खोह से एक विशालकाय गिद्ध ने अपनी गर्दन धीरे से निकाली। उस ध्वनि तथा उसके विशाल शरीर को देखकर तो मैंने सोचा अभी तक जीवित रहकर कुछ दिन बीत सकते थे अब तो बिलकुल ही नहीं बचेंगे। तभी युवराज अंगद ने इतना ही कहा “एक गृद्धराज जटायु थे जिन्होंने अपने प्राणों की बाजी लगाकर वीरगति प्राप्त की जिनकी भार्या को बचाने में, और एक अन्य गृद्धराज उन्हीं श्री राम की सेना का आहार लेना चाहते हैं।”
गृद्धराज ने जटायु नाम सुनते ही भावुक होकर कहा तुम लोग निर्भय होकर मुझे मेरे भाई गृद्धराज जटायु के बारे में बताओ। तब युवराज ने सारा वृत्तान्त सुनाया। गृद्धराज ने कहा मेरा नाम सम्पाती है, मैं और जटायु दोनों भाई हैं। अपने बल पर मुझे बड़ा अभिमान था। मैंने अपने भाई से कहा चलो वेग से सूर्य तक पहुँचते हैं जटायु कुछ दूर जाकर लौट गया। मैं अभिमानवश आगे बढ़ता गया और सूर्य की तपन से मेरे पंख जल गए और मैं इस स्थान पर आकर गिरा। तबसे मैं इसी स्थान पर पड़ा हूँ। पंख न होने से आहार ठीक से नहीं ले पाता हूँ। यदाकदा चोंच से सागर तट पर आए जानवरों का ही आहार ले पाता हूँ। मेरी स्थिति को देखते हुए एक कृपालु मुनि जिनका नाम चन्द्रमा था मुझे सान्त्वना देते हुए कहा कि जब राम जी के दल सीता की खोज में इधर आएं तो उन्हें वह स्थान दिखा देना। उन्होंने कहा मैं देख सकता हूँ सौ योजन सागर पार त्रिकूट पर्वत पर लंका में अशोक वाटिका के अन्दर जनकनंदिनी हैं तुममें जो भी इस सागर को पार कर वहाँ पहुँच सकता है प्रयास करो। अब मैं अपने भाई को तिलांजलि देकर उसके पास जाऊँगा।
अब भय की स्थिति तो समाप्त हो चुकी थी किन्तु संशय था सौ योजन पार कर सकने की क्षमता किसमें है। ऋक्षराज जामवन्त ने अपनी असमर्थता वृद्ध होने के कारण बताई। कुछ वानरों ने अपनी-अपनी क्षमता बताई किन्तु वह भी सौ योजन पार करने की नहीं थी। युवराज अंगद ने कहा मैं एक छलांग में पार तो जा सकता हूँ किन्तु वापस आने पर शंका है। ऋक्षराज जामवन्त ने कहा नहीं आप दल नायक हो आपको नहीं जाना है। अब कौन जाए? मेरे जैसे साथी तो दुबके पीछे ही बैठे रहे। एक वृक्ष से दूसरे तक जाना तो हो जाता पर यह सो योजन सोच ही नहीं सकता। सभी चिन्तित एवं सोच में पड़े थे तभी ऋक्षराज जामवन्त जी ने पीछे बैठे अंजनी नन्दन को सम्बोधित करते हुए कहा हे पवनतनय, आप किस सोच में एकदम शान्त बैठे हैं। समस्या का समाधान कैसे हो? आपको तो देवताओं ने वरदान दिया है। आप बुद्धिमान, ज्ञानवान, नीतिवान, बलवान, शौर्यवान हैं ही साथ ही प्रभु राम के नाम जप से तेजोमय भी हैं और उन्हीं के कार्य हेतु ही तो आपका अवतरण हुआ है। आपको ऐसे शान्त बैठे देखकर आश्चर्य हो रहा है। ‘रामकाज हेतु आपका अवतरण’ सुनकर पवनपुत्र सोते से जगे। उन्होंने धीरे-धीरे अपना आकार बढ़ाना प्रारम्भ किया। देखते देखते विशाल सुवर्ण पर्वत के समान उनका शरीर हो गया। रोम रोम से राम नाम की ध्वनि गुंजायमान होने लगी। उनके चरण ऐसे बढ़े मानों समुद्र को ऐसे ही लांघ जाएंगे। विशाल वक्ष और कन्धे पर विशाल गदा तथा जामवन्त जी की प्रेरणा से ओज से भरपूर सिंह समान गर्जना करते हुए पवनपुत्र ने जामवन्त जी से कहा- यह सागर क्या है मैं पूरी लंका को ही समुद्र में डुबो सकता हूँ। माँ जानकी का पता लगाने में जो भी बाधक होगा चाहे लंका की सेना या लंकाधिपति ही क्यों न हों मैं सबका संहार कर सकता हूँ। जामवन्त जी ने महावीर की उद्घोषणा सुनकर उन्हें शान्त करते हुए माँ जानकी की सुधि लेकर ही आने को कहा। प्रभु राम स्वयं वानर एवं रीछ की सेना लेकर रावण का संहार कर जानकी को लाएंगे।
हमारे जैसे वानर हनुमान जी के इस स्वरूप एवं गर्जन को सुनकर अति उत्साह से ‘जय हनुमान’, ‘जय जय श्री राम’ का उद्घोष करने लगे। हमें लगने लगा पवनतनय निश्चित रूप से जामवन्त जी के निर्देश का पालन करते हुए सफलता पूर्वक आएंगे। पवनपुत्र के इस उद्घोष से टिमटिमा रहे दीपक पुनः प्रज्ज्वलित से हो गए। मेरी और मेरे साथियों की प्रसन्न्ता और उल्लास की सीमा नहीं रही। मैं तो हाथ जोड़े पवनसुत की इस छवि को अपलक निहार कर गदगद हो रहा था।
जामवन्त जी के निर्देशानुसार लंका प्रस्थान करने हेतु मारुतिनन्दन ने हम सभी वानरों से जब तक वे न लौटें भरपूर आहार लेते रहने का आग्रह किया। मैं वानर दल में आकृति में सबसे छोटा था किन्तु चंचलता अत्यधिक थी। कन्दराओं, छोटी गुफाओं में दीर्घ आकृति के वानरों को जहाँ असुविधा हो सकती थी मैं आगे बढ़कर तत्क्षण अन्दर तक जाकर वहाँ की स्थिति देखकर बतला देता था। मेरे इस सक्रिय प्रयास को युवराज अंगद, ऋक्षराज जामवन्त तथा केशरी कपि किशोर तथा अन्य कपिश्रेष्ठों ने देखा और मैं उन सबका स्नेहभाजन बन गया। पवनतनय तो मुझ पर अत्यन्त स्नेहमय हो गए थे। उनके आज के स्वरूप को देखकर मैं तो आश्चर्यचकित था ही साथ ही प्रसन्न भी कि इतने बलशाली, राम जी के अतिप्रिय मारुतिनन्दन का मैं कृपापात्र हूँ।
पवनपुत्र ने अपने को उसी स्वरूप में स्थिर रखते हुए एक बड़ी सी शिला की ओर प्रस्थान किया। हम सब वानर एवं रीछ दल के साथी उनकी जयजयकार करते हुए उनके पीछे पीछे चलते गए। उस शिला से एक ऊँचे पर्वत पर एक ही छलांग में पहुँचकर मारुतिनन्दन ने सभी को प्रणाम करते हुए ‘जय श्रीराम’ के उद्घोष से लंका की ओर छलांग लगाई। हम सभी इस प्रस्थान को टकटकी लगाए तब तक अपलक निहारते रहे जब तक पवनपुत्र आँखों से ओझल नहीं हुए।
मारुतिपुत्र के प्रस्थान के पश्चात् हम सभी जामवंत जी और युवराज अंगद के समीप बैठे रहे। आपसी चर्चा में केशरी कपि किशोर का वह स्वरूप ही रहा। हम सभी आश्वस्त थे कि कपिश्रेष्ठ निश्चित ही अभीष्ट कार्य सिद्ध करके लौटेंगे। धीरे-धीरे छोटे-छोटे दल बांधकर हम सभी उस स्थान से अलग-अलग स्थान पर जा कर बैठ गए।
……….. शेष अगले अंक में
