दारा शिकोह

शालिनी त्रिपाठी,
नवी मुंबई

“दारा दारा” आवाज देती हुई जहानआरा आ गई। “क्या हुआ आपा?” दारा शिकोह ने बहन की तरफ देखते हुए कहा। “हमने सुना है औरंगज़ेब बंगाल से अपने लश्कर के साथ इधर ही आ रहा है, शहसुजा और मुराद भी उससे मिले हुए हैं। तुम अपने लश्कर को तैयार रहने को कहो क्योंकि मुझे इरादों पर कुछ शक हो रहा है।” दारा शिकोह ने फ़ौरन अपने सिपहसालार को बुला भेजा।

दारा शिकोह शाहजहां का बड़ा बेटा और सबसे पसंदीदा भी था। वह था भी ऐसा कि दूसरे मजहब की किताबों को पढ़कर उनका अरबी-फारसी में अनुवाद करने का ख्याल किसी भी मुगल बादशाह को नहीं आया। दारा शिकोह शुरुआत से ही नरमदिल और कलाप्रेमी था। वैसे तो हिंदू धर्म के साथ मेल-मिलाप अकबर के समय ही शुरू हो गया था, लेकिन अगर दारा शिकोह जैसी सोच वाला बादशाह आगे तख्त पर बैठे तो हिंदुस्तान पूरी दुनिया में सबसे आगे होगा। ऐसी सोच और दारा शिकोह के समझदारी भरे रवैए के चलते ही वह अपनी सबसे बड़ी आपा जहानआरा का सबसे प्यारा था।

वैसे तो जहानआरा अपने और बाकी भाई-बहनों को भी बहुत प्यार करती थी, पर औरंगज़ेब से उसे हमेशा खतरा महसूस होता था। यह खतरा उसे अपने अब्बा हुजूर और दारा शिकोह के लिए लगता था क्योंकि अब्बा हुजूर के खास बेटे होने की वजह से बाकी तीन भाई उससे बहुत जलते थे और अब तो वे एक साथ मिलकर इन दोनों को ही शिकस्त देने आ रहे थे।

जहानआरा इस ख्याल से ही कांप जाती थी कि औरंगज़ेब हिंदुस्तान का बादशाह बनकर दिल्ली के तख्त पर बैठ जाएगा क्योंकि वह बहुत कट्टर और निर्दय था। वैसे वह मुसलमानों के लिए बहुत अच्छा था, लेकिन बाकी मजहब की रियाया उससे बहुत परेशान थी। जहानआरा ने अपनी परदादी जान जोधाबाई के बारे में बहुत सुना था और वह जानती थी कि इस मुल्क को आगे ले जाना है तो दोनों मजहबों के बीच अच्छे रिश्ते जरूरी हैं और इसके लिए दारा का बादशाह बनना ज़रूरी था।

जहानआरा ने एक-एक पैग़ाम मुराद और शाहसुजा को भेजा और अपनी मोहब्बत का वास्ता देते हुए औरंगज़ेब का साथ न देने की गुजारिश की। दोनों भाई अपनी जहानआरा से बहुत मोहब्बत करते थे, सो उन्होंने अपने-अपने लश्कर वापस ले लिए। दारा शिकोह और औरंगज़ेब के बीच हुई लड़ाई में दारा शिकोह ने फतेह हासिल की और हिंदुस्तान का बादशाह बना। औरंगज़ेब को माफ करके वापस बंगाल भेज दिया गया।

(अगर ऐसा होता तो आज हिंदुस्तान का रंग-रूप अलग होता, जिसमें कट्टरता और दूसरे मजहब के लिए नफरत की कोई जगह न होती।)

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